इंडोनेशिया के क्यूरी बारोह गांव में बहुत से साइबर कैफे को कहा गया है कि वे सस्ती दरों पर उपलब्ध अपनी वाई-फाई सेवाओं को तत्काल प्रभाव से बंद कर दें, क्योंकि इस कारण बड़ी संख्या में बच्चे पोर्न और वे साइट्स देख रहे हैं, जो उनके लिए बेहद हानिकारक हैं। यह सिर्फ इंडोनेशिया की बात नहीं है। स्कूलों में अध्यापकों से बात करें, तो पता चलता है कि इन दिनों उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बच्चे पोर्न खूब देख रहे हैं। लगातार आती खबरों पर गौर करें, तो पता चलता है कि छोटी उम्र के बच्चे दुष्कर्म जैसे अपराध कर रहे हैं। उन्हें इसकी गंभीरता के बारे में पता नहीं है। वे तो वह कर रहे हैं, जो वे देख रहे हैं।
भारत सरकार ने हाल ही में ऐसी बहुत-सी साइट्स पर रोक लगाई है, जिनमें बच्चों के साथ होते बलात्कार या दूसरे अपराध दिखाए जाते हैं। ऐसी साइट्स तक मौजूद हैं, जो दुष्कर्म को एक आनंददायक घटना की तरह पेश करती हैं। और इनके दो-दो लाख से ज्यादा सदस्य बताए जाते हैं। इसके अलावा बाल वेश्यावृत्ति या चाइल्ड सेक्स संबंधी साइट्स भी बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। जब भी इन पर रोक की बात होती है, तो कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर शोर मचाने लगते हैं। लेकिन अभिव्यक्ति का यह मतलब नहीं है कि समाज में अच्छे-बुरे की पहचान भुला दी जाए। बच्चों के दिमाग में बालपन से ही सेक्स से जुड़ी बातें दिखाना और लड़कियों- महिलाओं को सेक्स की वस्तु की तरह पेश करना बेहद घातक है। यह किसी भी समाज के लिए अच्छा नहीं है, चाहे वह पश्चिम का समाज हो या हमारा समाज।
तकनीक को बच्चों के लिए भगवान की तरह पेश किया जाता रहा है। कहा जाता रहा है कि अगर बच्चा टेक्नो सेवी या तकनीक में पारंगत है, तो उसकी सारी समस्याएं आनन-फानन में हल हो सकती हैं। दुनिया के दरवाजे उसके लिए खुल जाते हैं। पर बहुत बार खुले दरवाजे तमाम तरह के अपराधों को भी निमंत्रित करते हैं। साइबर स्पेस ऐसा ही दरवाजा है, जिसके दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
खास तौर से बच्चों के हाथों में अगर हमेशा लैपटॉप, टैबलेट या मोबाइल रहता है, तो उसका असर पड़ता है। इससे बच्चे चिड़चिड़े और हिंसक हो रहे हैं। वे मामूली बातों पर बदला लेने को तैयार हो रहे हैं। इसका हल यह बताया जाता है कि माता-पिता और अध्यापकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चे क्या देख रहे हैं, वे क्या कर रहे हैं। मगर क्या चौबीसों घंटे बच्चों पर नजर रखना संभव है? फिर ज्ञान की एक उम्र भी होती है। अगर पांच साल के बच्चे को पचास साल के व्यक्ति का ज्ञान यों ही मिल जाए, तो उसका क्या होगा!
समय और उम्र के साथ हमें अपने आप ही बहुत-सी बातों का पता चल जाता है। सेक्स से जुड़ी बातों को जानने की भी इसीलिए एक खास उम्र निर्धारित की गई है। लेकिन तकनीक इन दिनों बच्चों को समय से पहले वह सब कुछ सिखा रही है, जो उनके लिए ठीक नहीं है। इससे बच्चों की मासूमियत खत्म हो रही है।
बेशक आज हम तकनीक से बच नहीं सकते। कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के बिना अब जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पर उसका दुरुपयोग कैसे रोका जाए, यह सवाल जरूर परेशान करता है। बच्चों के लिए काम करने वाले बहुत से संगठन या एनजीओ कहते हैं कि बच्चों को किसी बात के लिए रोकना नहीं चाहिए। इससे उनका विकास रुक जाता है। पर बच्चों को अच्छे-बुरे का फर्क समझाना हो, तो बहुत-सी बातों के लिए न कहने के अलावा रास्ता क्या है!