दस साल पहले 29 सितंबर के दिन महाराष्ट्र के भंडारा जिले के एक छोटे से गांव में एक परिवार के चार सदस्यों की बहुत ही निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी। जिनकी हत्या हुई, वे सब दलित थे। उस गांव में केवल चार दलित परिवार थे। उनमें से एक सुरेखा और भय्याजी भोटमांगे का था।
भोटमांगे परिवार के पास पांच एकड़ जमीन थी, लेकिन गांव की पंचायत ने उन्हें इस जमीन का मालिक होने का किसी प्रकार का सबूत देने से इन्कार कर दिया। सुरेखा पक्का घर बनाना चाह रही थी, तो पंचायत ने इसकी अनुमति भी नहीं दी। गांव में वर्चस्व रखने वाली जातियों के सदस्य को यह फूटी आंख नहीं भाता कि एक दलित परिवार के पास अपनी जमीन भी हो और वह पक्के घर में रहने का सपना भी देखे।
सितंबर 2006 में बगल के गांव के एक दलित को खैरलांजी के कुछ उच्च जाति के लोगों ने पीटा। उसकी सहायता सुरेखा ने की और पुलिस के सामने उसने सही बात भी बताई। मार-पीट करने वालों को गिरफ्तार करके फौरन जमानत पर छोड़ दिया गया। वह सीधे सुरेखा के घर पहुंचे। उनके साथ गांव के और भी लोग थे। उन्होंने सुरेखा, उसकी बेटी प्रियंका और उसके दो पुत्र-दीपक और रौशन को घर से बाहर निकाला। रौशन को आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका भी कोई ख्याल हत्यारों को नहीं था। उन्होंने दीपक और रौशन को पीट-पीटकर मार डाला। प्रियंका और सुरेखा के साथ उन्होंने क्या-क्या किया, उसका ठीक से वर्णन करना कठिन है, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि दोनों के शरीर बुरी तरह घाव से भरे हुए थे।
पुलिस बहुत देर में पहुंची। कार्यवाही भी बहुत सुस्ती के साथ हुई। न तो ठीक से पोस्टमार्टम हुआ, न ही सही तरीके से लाशों की डॉक्टरी जांच हुई। अगर कुछ पत्रकार दिलचस्पी नहीं लेते, तो मामला दब ही जाता।
मामले की सुनवाई ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ में हुई और 54 आरोपियों में से चार को सजा-ए-मौत सुनाई गई और दो को आजीवन कारावास। लोगों को कुछ तसल्ली हुई, हालांकि इसकी टीस जरूर थी कि आरोपियों के खिलाफ एससी ऐक्ट के अंतर्गत मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। अगले साल, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत का फैसला बदल दिया और आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा दे दी।
भय्याजी भोटमांगे अब अकेले पड़ गए हैं। उन्हें गांव छोड़ना पड़ा है। उस पांच एकड़ जमीन को, जिसके लिए उसका पूरा परिवार अपनी जान गंवा चुका है, उसे कौड़ियों के भाव गांव के किसी उच्च जाति के किसान को लीज पर देना पड़ गया है। एससी/एसटी ऐक्ट के न लगने से, उसे मुआवजा भी नहीं मिला है। दस साल के बाद भीम न्याय की उसकी लड़ाई जारी है।
खैरलांजी की इस घटना में दलित उत्पीड़न कि लंबी और अंतहीन दास्तां के कई पहलू मौजूद हैं। 29 सितंबर के एक दिन पहले, 28 सितंबर को भगत सिंह की जयंती होती है। देशभर में बहुत ही जोश के साथ जयंती मनाई जाती है। भगत सिंह इस बात पर बहुत सोचते थे कि अंग्रेजों से आजादी पाने के बाद कैसा भारत बनना चाहिए। उन्हें हर तरह की समानता का ही भारत चाहिए था। इसीलिए उन्होंने ‘अछूत समस्या’ के अपने लेख में दलितों का आवाहन किया ‘एक हो जाओ, आत्म-निर्भर बनो और फिर पूरे समाज को चुनौती दो। तब तुम देखोगे कि कोई तुम्हे अधिकारों से वंचित नहीं रख सकता। दूसरों को तुम्हंे छलने का मौका मत दो। दूसरों से कोई उम्मीद भी मत करना। तथाकथित अछूतों, जनता के असली भाई और सेवक, उठो। अपने इतिहास को जानो।’