आज जब सब कुछ मंदी और मंडी से संचालित हो रहा है, लोग अपने सपने लिए महानगर की ओर भागे जा रहे हैं और विश्वास की परिभाषा लगातार बदलती जा रही है, ऐसे वक्त में 'दलाल की बीवी' को पढ़ना अपने अनुभव की दुनिया को और समृद्ध करना है।
रवि बुले के इस नए उपन्यास 'दलाल की बीवी' को मंदी के दिनों में लव, सेक्स और धोखे की कहानी कहा गया है। इससे पहले 2008 में अपनी पहली कहानी पुस्तक ‘आईने सपने और वसंतसेना’ और 2012 में चार लंबी कहानियों की पुस्तक ‘यूं न होता तो क्या होता’ देकर रवि पाठकों का प्यार जीत चुके हैं।
रवि का यह उपन्यास आज के दौर की सर्वमान्य एवं प्रचलित शैली पर सृजित अनूठा योग है। इसे प्रयोग न कहकर 'योग' कहना विशिष्ट अर्थ लिए हुए है। यह वह लोकप्रिय दास्तान है, जो ग्लोबल गहराई लिए हुए है। दलाल शब्द जेहन में कौंधते ही एक नया संसार दिमाग में चौंधियाने लगता है, जिससे आजकल के कुर्सीलालची तक नहीं बचे हैं।
इसमें उल्लिखित जीवन के विविधमयी रंग इन्द्रधनुषीय रोचकता का ताना-बाना बुन चुके हैं। दलाल और बीवी के कारनामों से सब बखूबी परिचित हैं। और जब बीवी दलाल की होती है तो गुलों से परहेज करवाते हुए अजीब किस्म के गुलगुले खिलाती है।
पुस्तक का सिर्फ एक अंश पढ़कर ही इसके मोहपाश से बचा नहीं जा सकता, जबकि सारी कथा इसके इर्द-गिर्द रची गई है, "जिसने भी सुना, वह चकित था। बिल्लियों की हत्या सुर्खियों में तो थी, लेकिन किसी को कल्पना नहीं थी कि हत्या करने वाली एक औरत निकलेगी। पशु कल्याण के लिए काम करने वाले एनजीओ को उसके घर से बिल्लियों की तीन लाशें भी मिलीं। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया, हत्याओं का जो कारण सामने आया, वह बेहद अजीब था और उस पर आसानी से विश्वास नहीं होता था। मात्र तैंतीस साल की मिट्ठू कुमारी प्रीमैच्योर मेनोपॉज की शिकार होकर मानसिक विचलन के कगार पर थी।"
आज जीवन की प्रत्येक कहानी में जवानी, मोबाइल फोन, सेक्स, डांस, साजिशें इत्यादि भरपूर मात्रा में पठनीयता में बढ़ोतरी करती चलती हैं। यही सफलता की वह एकमात्र कुंजी है, जो जिसके हाथ लग जाए, जिसे पूरी तरह समझ में आ जाए – उसे लेखन की किसी विधा में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। फिर रचनाकार रवि बुले मीडिया के गहन जानकार हैं, इससे भला कोई कैसे इंकार कर सकता है।
उपन्यास का एक-एक शब्द, हरेक वाक्य मस्ती से ओत-प्रोत है। समाज के मौजूदा दौर की कहानी सच्चाइयों की वह अंदरूनी परतें उधेड़ कर बिखेर रही है, जो पुष्पों की सुगंध से दूर रहकर भी मौसम में मोहकता की बानगी की अतुलनीय मिसाल है। एक बिल्ली और उसके छोनों के जरिए सब कुछ कह दिया गया है। आज प्रत्येक प्राणवान के जरिए वह सब कहा जा रहा है, जो यूं कहना संभव नहीं है। यह वर्तमान दौर की प्रचलित और लोकप्रिय शैली बन गई है। श्वान स्वामिभक्ति के अनुपम उदाहरण बनकर सामने हैं।
सिर्फ साहित्य ही नहीं, सिनेमा भी इनसे लबालब है। परोक्ष तौर पर कहने की यह अद्भुत शैली सबको भा रही है। सिर्फ तेज गति-प्रगति ही नहीं, समाज में घट रहे मूल्यों का सकारात्मक प्रभाव साहित्य पर दिखाई दे रहा है। पुस्तक के बारे में हबीब कैफी का यह कहना कि "मंटो अगर आज होते तो निश्चित रूप से कुछ ऐसा ही लिखते", एकदम मुफीद है।
दलाल की बीवी
लेखक- रवि बुले
हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया
मूल्य – 199 रुपये