कटक (ओडिशा) के एक शहर में डाकू राम खान का आतंक व्याप्त था। वह चाहे जिसके घर धावा बोलकर वह उसे लूट लेता था। लोग उसका नाम सुनकर ही थर-थर कांपने लगते थे। हां, महात्मा हरनाथ जी के प्रति वह अवश्य श्रद्धा रखता था। वेश बदलकर कभी-कभी उनके प्रवचन सुनने भी पहुंच जाता था।
महात्मा हरनाथ जी के भक्तों ने एक दिन उनके पास आकर गुहार की, महाराज, आप राजा को आदेश देकर राम खान का खात्मा करा दें। उसके रहते इस क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं हो सकती। यह सुनकर संत मुस्कराए और कहा, यदि राम खान के अंदर की शैतानियत का अंत कर दिया जाए, तो कैसा रहेगा?
ये शब्द कहने के बाद वह उठे और राम खान के अड्डे की ओर चल दिए। निर्जन वन में एक पेड़ के नीचे बैठे डाकू ने महात्मा जी को पास आते देखा, तो वह उनके चरणों में गिर पड़ा। बोला, महाराज, मैंने आजीवन पाप किए हैं। आज आपके दर्शन के बाद मैं प्रायश्चित के लिए नदी में डूबकर प्राण देना चाहता हूं।
महात्मा बोले, नहीं राम खान, आत्महत्या करना घोर पाप है। पाप का प्रायश्चित भगवान के नाम के जाप से ही संभव है। आज से घृणा के स्थान पर प्रेम का संकल्प लो। भगवान के नाम का अमृतपान करो। और उसी समय राम खान वृंदावन के लिए रवाना हो गया। यमुना तट पर जीवन भर साधना कर उसने अपना नाम ब्रज के प्रमुख भक्तों में अंकित करा लिया।