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महंगाई का रोना

Mon, 09 Mar 2015 07:53 PM IST
पूरन सरमा
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सुबह बुलाया था मुख्यमंत्री ने। वह बोले, देखो, हम सड़कें चौड़ी कर रहे हैं। आवागमन सुविधाजनक होता जा रहा है।
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मैंने कहा, वह तो ठीक है, पर गांवों पर भी ध्यान दें, तो अगले चुनाव में नाव किनारे जा लगेगी।

वह थोड़ा झुंझलाकर बोले, गांवों और चुनावों की चिंता तुम छोड़ो। मैंने तुम्हें राजधानी में हो रहे विकास के बारे में बताने के लिए बुलाया था।

मैं बोला, विकास की तो मत पूछिए। विकास की तो आपने गंगा बहा दी है।

वह बोले, विकास की बहती गंगा पर तुम एक ‘राइट अप’ लिख मारो।

मैंने कहा-‘लिखने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन कुछ चिंताजनक बातें भी हैं। जैसे भुखमरी को ही लीजिए, अब भी कई इलाके में लोगों के भूखे मरने की खबर है।

वह बोले, जरा धीरे बोलो। भुखमरी को कंटीन्यू करने दो। यह बहुत जरूरी है। काफी लोग जूझ रहे हैं। काफी लोग काम कर रहे हैं। इस तरह काफी लोग खा रहे हैं। काफी लोग जीविका जुटा रहे हैं। भुखमरी जरूरी है हमारे लिए। अपने राइट अप में तुम भुखमरी पर मत लिखना। हमने जो सड़कें चौड़ी की हैं, उस पर गौर करो। हमारे दौर में विकास की जो गंगा बह निकली है, उसे केंद्रबिंदु बनाना है।

मैं बोला, सड़कें तो वाकई बहुत चौड़ी हो गई हैं। लेकिन सर, इधर सड़क बनकर तैयार होती है और उधर दूसरे ही दिन उन्हें खोद दिया जाता है। कभी सीवर लाइन, तो कभी टेलीफोन के लिए?
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‘इसे भी छोड़ो, इसे मैं देख लूंगा, राइट अप में इसका भी जिक्र नहीं करना है। हमारी सड़कें पेरिस का मुकाबला कर रही हैं। इस पर ध्यान देना है तुम्हें, वह बोले।

मैंने कहा, सड़कों के मामले में तो हम पेरिस से आगे जा रहे हैं। परंतु महंगाई तो सुरसा की तरह फैलती जा रही है।
वह बिगड़ गए, तुम लोगों में यही कमी है। जब देखो, महंगाई का रोना रोने लगते हो। अरे, यह तो देखो कि देश कितनी तरक्की कर रहा है।

मेरे पास सहमति में सिर हिलाने के सिवा चारा नहीं था।
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