उल्लेखनीय है कि होर्मुज मार्ग में जहाजों पर ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हमले किए, तो इसके जवाब में ईरान ने भी बहरीन व कुवैत स्थित अमेरिकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया। स्थितियां इस तरह बिगड़ीं कि नाटो सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अब वह ईरान के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते। इसका पहला असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की बढ़ती बेचैनी के रूप में सामने आया है।
दरअसल, यह उस वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा है, जो पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के चलते लगातार कमजोर होती जा रही है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का करीब 90 प्रतिशत होर्मुज के रास्ते ही आयात करता है। 28 फरवरी को पश्चिम एशियाई संकट की शुरुआत से पहले तक भारत करीब 60-70 फीसदी कच्चे तेल का आयात समुद्री मार्ग से करता था, जो अब गिरकर 20-25 फीसदी रह गया है। ऐसे समय में, जब अल नीनो और कमजोर मानसून पहले ही अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल संकेत दे रहे हैं, तब पश्चिम एशिया में फिर से गहराती अशांति परेशानियां बढ़ाने वाली ही है।
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण क्षेत्र की लागत बढ़ना तय है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर ही पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं कि ईरान किसी भी सूरत में होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ, ट्रंप मनमाने ढंग से ईरान का दंभ तोड़ने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को आतुर हैं।
जो मध्यस्थ हैं, वे भी युद्धरत देशों को यह समझाने में असक्षम दिख रहे हैं कि युद्धविराम केवल कागज पर दर्ज एक समझौता नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर संवाद से जीवित रखना पड़ता है। यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया, तो पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया एक ऐसे अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकती है, जिसकी आर्थिक और रणनीतिक कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ेगी।