अन्य संसदीय सीटों के बनिस्बत गरीब और निम्न जाति के मतदाताओं की अधिकता वाली पलामू संसदीय सीट (झारखंड) से 2009 में जब कामेश्वर बैठा ने चुनाव लड़ने का फैसला लिया, तो उन्होंने अपने दामन पर लगे आपराधिक दाग धोने की कोई कोशिश नहीं की। उनके ऊपर कई गंभीर आरोप थे, जिसे वह गलत बताते रहे। उन पर हत्या के 17, हत्या की कोशिश करने के 22, खतरनाक हथियार से हमला करने के छह, चोरी के पांच, फिरौती वसूली के दो जैसे कई आरोप थे, जो उन्होंने मुख्यधारा की राजनीति में उतरने से पहले बतौर माओवादी नेता 'कमाए' थे। इन सबके अतिरिक्त वह उस समय जेल में भी थे और चुनावी अभियान के दौरान एक बार भी जेल से बाहर नहीं निकले। लेकिन मतदाताओं पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, और उन्होंने रॉबिनहुड की छवि वाले इस शख्स को संसद तक पहुंचाया।
इस साल भारतीय राजनीति में उत्साह की नई लहर चल रही है। उभरता शहरी मध्यवर्ग दागी छवि वाले राजनेताओं को सत्ता से दूर रखने की मांग कर रहा है। राजधानी दिल्ली में ही इंटरनेट कैंपन के माध्यम से लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मंच पर आ चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी जनभावना का ख्याल रखकर यह फैसला सुनाया कि निचली अदालत द्वारा सजा प्राप्त किसी राजनेता का अपनी सजा के खिलाफ मात्र अपील दायर कर कुर्सी पर बने रहना गैरकानूनी है। यह फैसला उन राजनेताओं को अयोग्य बनाता था, जिन्हें निचली अदालत द्वारा दो साल की सजा मिल चुकी है।
बहरहाल, इन तमाम प्रयासों को उस पुराने भारत में बड़ी चुनौती मिलेगी, जहां आज भी बड़े पैमाने पर जाति आधारित मतदान होते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में, जिनमें कामेश्वर बैठा का संसदीय क्षेत्र भी शामिल है, चुने हुए अधिकतर प्रतिनिधि आपराधिक आरोपों का सामना करते हैं। इनमें कई तो भ्रष्टाचार से जुड़े होते हैं, लेकिन अधिकतर आपराधिक ही होते हैं। आमतौर पर मतदाता इन आरोपों को झूठा मानता है और कुलीन वर्ग द्वारा गरीबों के नेता को कुचलने की एक कोशिश के तौर पर देखता है। ऐसे में कामेश्वर बैठा मजाक में ही सही, अगर यह कह रहे हैं, ‘निचली अदालत द्वारा दोषी सभी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने पर पूरी संसद ही खाली हो जाएगी,’ तो इसके कई निहितार्थ हैं।
इन सबके बीच रशीद मसूद के बाद लालू प्रसाद यादव ऐसे दूसरे नेता बन गए हैं, जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में अपनी संसद सदस्यता गंवाई है। 17 साल के इंतजार के बाद चारा घोटाले में उन्हें सजा मिली है। लोकलुभावन मनोरंजन में माहिर इस शख्स ने, जो चरवाहों की एक जाति से आया है, अदालत की तारीखों को 'राजनीतिक नाटक' में बदल कर रख दिया था। वह एक बार समर्थकों की भीड़ के साथ रिक्शे पर बैठकर अदालत पहुंचे, तो पिछली बार जेल से निकलते वक्त उन्होंने हाथी की सवारी भी की। उन्हें सजा मिलने के साथ ही ऐसी ड्रामेबाजी अब बंद होती दिख रही है। वैसे जिस तरह बिरसा मुंडा जेल के गेट पर पिछले सप्ताह उनके समर्थकों की भारी भीड़ डटी रही और नियमित अंतराल पर वह मुलाकातियों से मिलते रहे, वह बताता है कि लालू अब भी अपना राजनीतिक साम्राज्य का प्रबंधन करने में सक्षम हैं। हालांकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता ने जब यह शिकायत दर्ज कराई कि बिरसा मुंडा जेल में लालू यादव अपने समर्थकों से मिलकर जेल नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और लालू यादव ने मुलाकातियों से मिलने का समय बांध दिया, तो उनके समर्थक यह कहते देखे गए कि राजद सुप्रीमो पर गलत आरोप लगाए गए हैं। वे यही मानते हैं कि दिल्ली के लोग नहीं चाहते कि वंचित तबके से कोई आगे बढ़े।
एक अध्ययन के मुताबिक, 2008 के बाद विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीतने वाले तकरीबन 30 फीसदी जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। इसके कारण कई हैं, लेकिन चूंकि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली ऐसी है कि उम्मीदवार वोटरों को प्रभावित करने के लिए पहले 'बाहुबलियों' और फिर बाद में 'धनपतियों' पर निर्भर हो जाता है, लिहाजा भ्रष्टाचार तेजी से फैलता है। लेकिन सच यह भी है कि यहां चुनाव में खर्च करने की सीमा इतनी कम तय की गई है कि उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए कानून तोड़ने को बाध्य हो जाता है।
इन सबके बीच भारतीय राजनीति की एक और तस्वीर है, जिसे कामेश्वर बैठा के बहाने समझा जा सकता है। बैठा का उभार 1970 के दशक के किसान आंदोलन से हुआ है। वह माओवादी लड़ाके के तौर पर जाने गए और उच्च जाति के भूस्वामियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। सत्ता-प्रशासन की नजर में बैठा विस्फोटक तैयार करने में उस्ताद तो थे ही, कई हमलों के मास्टरमाइंड भी थे। हालांकि बैठा इससे इंकार करते हैं। उनका मानना है कि उन्होंने मात्र उस विचारधारा को अपने जीवन में उतारा है, जिसे भारत सरकार ने 1986 में प्रतिबंधित कर दिया है। उन्होंने जेल में जब माओ और लेनिन को दोबारा पढ़ा और उसके बरक्स भारतीय समाज के आर्थिक और तकनीकी विकास का विश्लेषण किया, तब उन्हें लगा कि उन्हें अपनी विचारधारा में बदलाव लाना चाहिए। पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी जीत का अर्थ यह है कि जनता की नजर में उन पर लगे आपराधिक आरोपों का कोई महत्व नहीं। हालांकि संसद पहुंचने के बाद बैठा पर लगे कई आरोप वापस भी ले लिए गए।
बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कारण बैठा जैसे जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक जीवन भले ही दांव पर हो, पर आम आदमी यह भी मानता है कि ऐसा होना मुश्किल है। गरीबों के लिए लड़ने की वजह से उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चलाए जा रहे हैं। न्यायिक व्यवस्था पर उनका भरोसा कायम है।