आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद या विधानसभाओं में पहुंचने से रोकने का मामला पिछले कुछ दशकों से चिंता का विषय बना हुआ है। एक लंबे समय से स्वयंसेवी संगठन एवं विधिवेत्ता चुनाव सुधार की मांग करते आ रहे हैं। वर्ष 2000 में बने संविधान आयोग (जिसका मैं भी सदस्य था) ने भी 2002 में अपनी रिपोर्ट में निर्वाचन व्यवस्था में सुधार की सिफारिश की थी, ताकि राजनीति में आपराधिक तत्वों के प्रवेश को रोका जा सके। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को जो फैसला दिया है, वह चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को रद्द करते हुए इसे असंगत बताया है। अब तक की व्यवस्था में यदि कोई व्यक्ति किसी मामले में दोषी ठहराया जाता था और उसे दो वर्ष से ज्यादा की सजा होती थी, तो उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया जाता था। लेकिन यदि कोई व्यक्ति दोषी ठहराए जाने से पहले से ही संसद या किसी विधानसभा का सदस्य होता था, तो वह तीन महीनों के भीतर अपील दायर कर सदन का सदस्य बना रहता था। सुप्रीम कोर्ट ने कानून में मौजूद तीन महीने के भीतर अपील करने के प्रावधान को पक्षपातपूर्ण एवं विधि के समक्ष समता के अधिकार के खिलाफ बताते हुए उसे रद्द कर दिया है। अब जैसे ही अदालत द्वारा किसी जनप्रतिनिधि को दोषी करार दिया जाएगा, तो स्पीकर उसका संज्ञान लेकर संबंधित सांसद, विधायक की सदस्यता खत्म कर देंगे और उस सीट को खाली घोषित कर दिया जाएगा। फिर चुनाव आयोग उस सीट पर नए सिरे से चुनाव कराएगा।
लेकिन यह नहीं समझना चाहिए कि सिर्फ इस एक फैसले से निर्वाचन व्यवस्था की सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। मौजूदा निर्वाचन प्रणाली में बहुत से ऐसे विषय हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है। चुनाव सुधार के लिए कानून बनाने का काम संसद का है। लेकिन हमारे देश का राजनीतिक वर्ग, जिसमें सत्ताधारी दल और विपक्षी दल सभी शामिल हैं, अपने निहित स्वार्थों के कारण राजनीति में भ्रष्ट व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी चलाने, चुनाव लड़ने के लिए भारी धन चाहिए। एक प्रमुख राजनीतिक दल का दैनिक खर्च करोड़ों में है। एक जनप्रतिनिधि ने तो यहां तक कहा कि पांच करोड़ रुपये देने पर उसे पार्टी का टिकट मिला, फिर उसने आठ करोड़ रुपये चुनाव लड़ने पर खर्च किए और जब चुनाव जीता, तो उसे पार्टी कोष में भी पैसा देने के लिए कहा गया। ऐसे में ईमानदारी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। जाहिर है, राजनेता और राजनीतिक दल अपने खर्च के लिए ज्ञात व अज्ञात स्रोतों से चंदा लेते हैं। जो कोई भी व्यक्ति या संगठन इन्हें चंदा देता है, उनके अपने स्वार्थ होते हैं और ऐसे धन ज्यादातर काले धन होते हैं। काले धन एवं भ्रष्टाचार की व्यवस्था यहीं से शुरू होती है। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि राजनीति में आपराधिक तत्वों का प्रवेश दलों की इसी लिप्सा के कारण हुआ है। नतीजा यह हुआ कि आज लगभग 30 प्रतिशत जनप्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं।
कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि इस फैसले का दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि राजनेता अपने विरोधियों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने के लिए इसका बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं। इस संदर्भ में मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट ने कोई नया कानून नहीं बनाया है। इससे कानून का दुरुपयोग या भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता है। उसने तो सिर्फ एक विसंगतिपूर्ण कानूनी प्रावधान को रद्द किया है, जिससे कुछ हद तक राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगेगी। इसलिए मैं समझता हूं कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि सरकार इस फैसले की समीक्षा के लिए शीर्ष अदालत में अपील करेगी। हो सकता है कि सरकार शीर्ष न्यायालय से यह कहे कि वह कुछ खास मामलों को इसमें चिह्नित करे, जिसमें दोषी ठहराए जाने पर सदस्यता खत्म होगी और राजनीतिक अपराध जैसे मामले में दोषी ठहराए जाने पर सदस्यता खत्म न हो।
अगर इस तरह का कानून संसद बनाती, तो वह ज्यादा अच्छा होता, क्योंकि विधि के निर्माण की जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई है। पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में संसद ने बहुमत से फैसला लेकर ग्यारह सदस्यों की सदस्यता खत्म की थी। ऐसा ही वह आपराधिक तत्वों को राजनीति से दूर रखने के लिए भी कर सकती थी। लेकिन ऐसा करना राजनीतिक दलों के हित में नहीं हैं, इसलिए वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।
चूंकि विधायिका अपना काम नहीं कर रही है, ऐसे में देश के नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका को आगे आना पड़ता है। वैसे भी लोगों को न्याय दिलाना न्यायपालिका का प्रमुख कर्तव्य है, इसलिए वह अपने इस अधिकार का उपयोग करते हुए ऐसे फैसले देने के लिए मजबूर होती है। पहले निर्वाचन आयुक्त से लेकर अब तक जितने भी चुनाव आयुक्त हुए हैं, सबने विभिन्न सरकारों से निर्वाचन व्यवस्था में सुधार के लिए कानून बनाने की सिफारिशें की हैं, लेकिन उन सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता रहा है। न्यायिक व्यवस्था में भी काफी सुधार की जरूरत है, लेकिन उसके लिए कानूनों में संशोधन एवं नया कानून बनाने का काम तो संसद ही करेगी। इन सुधारों के लिए सरकार पर दबाव बनाने का काम मीडिया और आम जन ही कर सकते हैं और मैं समझता हूं कि उन्हें इसमें पीछे नहीं रहना चाहिए।