इस बार के लोकसभा चुनाव में हर मौसम का स्वाद है, लेकिन इस जीवंत, शोर-शराबे से भरी लोकतांत्रिक कवायद में केंद्रीय निर्वाचन आयोग में एक गिरावट दिख रही है। चुनाव आयोग का यह सांविधानिक कर्तव्य है कि वह रेफरी की तरह काम करे और चुनाव को निष्पक्ष बनाने के लिए हर शक्तियों का इस्तेमाल करे। लेकिन तीन सदस्यीय चुनाव आयोग उदासीन, लापरवाह और मैदान से बाहर के तीसरे अंपायर की तरह दिखता है, जो कभी-कभी गहरी नींद से जाग जाता है या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अपनी उपस्थिति का एहसास कराता है।
अब जरा सात चरणों में फैली लंबी चुनाव प्रक्रिया को देखें। निर्वाचन क्षेत्रों का चयन सबसे अधिक व्यक्तिपरक या लगभग राजनीतिक है। उत्तर प्रदेश और बंगाल में सात चरणों में चुनाव हो रहे हैं, जबकि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एक ही दिन में चुनाव हुए, आंध्र प्रदेश में तो विधानसभा के चुनाव भी हुए। निश्चित रूप से हिंसा और धांधली के भय पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि बंगाल में औसत मतदान 80 फीसदी से अधिक हुआ है।