फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

माकपा को याद आए श्रीकृष्ण

Thu, 03 Sep 2015 07:37 PM IST
शंभूनाथ शुक्ल
विज्ञापन
विज्ञापन
अब यह भाजपा की बढ़त का असर है या माकपा की स्वानुभूति का, पर कम से कम पहली बार केरल में कम्युनिस्टों को यह सुधि तो आई कि लोगों के विश्वास को अफीम कहकर नहीं टाला जा सकता। माकपा की केरल इकाई ने तय किया है कि वह इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपने बाल संगठन ‘बालसंघम’ के माध्यम से राज्य भर में झांकियां निकालेगी। माकपा का यह एक क्रांतिकारी फैसला है, वर्ना अभी तक तो कम्युनिस्ट पार्टियां धर्म को अफीम ही बताती रही हैं। मजे की बात यह कि धर्म को अफीम बताने के लिए वे मार्क्स की आधी-अधूरी उक्ति ही उद्धृत करती हैं। धर्म के बारे में मार्क्स की पूरी उक्ति यों है-'धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह, हृदयविहीन विश्व का हृदय, आत्मविहीन परिवेश की आत्मा है। यह जनता की अफीम है।' यानी मार्क्स जानते थे कि धर्म मनुष्य के दुखों को कहीं तो संबल देता है। मगर भारत में कम्युनिस्ट पार्टियां इससे दूरी बरतती रहीं। अब जब उनकी अनदेखी का लाभ भाजपा उठाने लगी, तो उनकी चेतना जागी।
विज्ञापन


केरल में माकपा नेताओं का मानना है कि झांकियां निकाल कर और ओणम पर सप्ताह भर का कार्यक्रम कर वे बच्चों और महिलाओं को अपने साथ बनाए रखेंगे, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित ‘बालगोकुलम’ में इनकी भागीदारी तेजी से बढ़ने लगी थी। पिछले साल ‘बालगोकुलम’ की झांकियों में कम्युनिस्ट परिवारों की महिलाओं और बच्चों ने खूब भागीदारी की थी। इससे भयभीत माकपा नेता इस बार अकेले कन्नूर जिले में ही 162 स्थानों पर श्रीकृष्ण की झांकियां सजाएंगे। पिछले दिनों इस कन्नूर जिले की अरुविक्कारा विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा ने खासी बढ़त ली थी। कन्नूर हिंदू बहुल जिला है और माकपा को डर है कि कहीं वह अपना वोट बैंक खो न दे। गणेशोत्सव के आयोजन के लिए भी वह भाजपा के लोगों को अपने साथ ले रही है। ‘बालसंघम’ के संरक्षक वरिष्ठ माकपा नेता पी प्रभाकरन का कहना है कि बालसंघम का जुलूस और झांकियां संयोगवश श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से आयोजित होंगे, पर यह आयोजन सिर्फ ओणम के लिए किया गया है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुताबिक, यह माकपा की सोची-समझी चाल है, क्योंकि वह नहीं चाहती कि उसके कार्यकर्ता ‘बालगोकुलम’ के आयोजन में हिस्सा लें।

धर्म को सिरे से खारिज कर देने की वामपंथियों  की प्रवृत्ति का ही नतीजा रहा कि कम्युनिस्ट पार्टियां केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के आगे नहीं बढ़ सकीं। हालांकि पश्चिम बंगाल में कॉमरेड ज्योति बसु जब तक मुख्यमंत्री रहे, वह हर साल दुर्गा पूजा महोत्सव में अवश्य हिस्सा लेते थे। उनका मानना था कि जनता की परंपराओं, उसके रीति-रिवाजों व विश्वासों से हमें खुद को काट नहीं लेना चाहिए। लेकिन उनके बाद के कम्युनिस्ट नेताओं का धर्म के बारे में नास्तिक छवि का हश्र यह हुआ कि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट बाहर हो गए। बहुसंख्यक समाज के विश्वास के प्रति अविश्वास जताने के कारण एक-एक कर सारे राज्य और इलाके उनकी पहुंच से दूर होते गए। केरल में यह नई लाइन देखकर लगता है कि कम्युनिस्ट अब कहीं दूसरा अतिवादी रास्ता न अपना लें।
विज्ञापन
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें