लॉकडाउन की वजह से बहुत सारे लोग, जिनको कोरोना हो सकता था या होने का डर था, वे अपने-अपने में घरों में बंद हो गए। इससे उन लोगों की पहचान करने में मदद मिली, जो इससे संक्रमित हो चुके थे या जिनको अधिक खतरा था। हमारा देश इस स्थिति में नहीं है कि सब कुछ सामान्य रखते हुए कोरोना से लड़ाई जारी रखी जाए। एक ऐसा वक्त जरूर आया था, जब हमें सचेत हो जाना चाहिए था। यह कहां से आया, कैसे आया! जैविक हथियार है या रूप बदलकर वार करने वाला कोई खतरनाक वायरस ! इन बातों में पड़ने का समय पीछे छूट गया है।
मेरे घर में अगर आग लग जाए, तो मुझे पहले से तो नहीं मालूम कि आग लगने वाली है। लेकिन आग लगने के बाद मेरे पास कुछ मिनट जरूर होंगे कि मैं यह तय कर सकूं कि कैसे निकलना हैऔर क्या-क्या लेकर निकलना है। हमारे सामने ऐसी ही एक चुनौती है। लोग मास्क, पीपीई किट, वेंटिलेटर और आईसीयू यूनिट्स की कमी की बातें कर रहे हैं, लेकिन मैं इन बातों की गहराई में नहीं जाऊंगा। हर फैसले के कुछ काले और सफेद पक्ष होते हैं। कोरोना के चलते देशव्यापी लॉकडाउन परिस्थितियों की मांग है। लॉकडाउन के दौरान हम लोगों ने बहुत कुछ सीखा है।
शुरू के दिन तो बड़े मजे में गुजर गए। कुछ दिन इस नाराजगी में गुजर गए कि अब कहां जाएंगे, कैसे जाएंगे! लोगों ने दोस्तों को समझना शुरू किया। घर वालों को समझना शुरू किया। उन लोगों ने आपको समझना शुरू किया। हर किसी को अपनी जिंदगी समझ में आई है। यह भी समझ में आया कि कौन आपको कितना प्यार करता है और कौन आपको कितनी नफरत करता है। सबकी असलियत बाहर आई, क्योंकि ऐसे हालात में लंबे समय तक खुद को छुपाकर रखना मुमकिन नहीं।
इस तरह की गतिविधियां कमोबेश सबके अंदर चल रही हैं। हो सकता है, आप इन्हें प्रत्यक्ष न देख पा रहे हों, लेकिन अर्द्ध चैतन्य रूप में इनसे सबका साक्षात्कार हो रहा है। आपकी जिंदगी में कौन, किस तरह की भूमिका का निर्वाह कर रहा है, जल्द ही हम सबके सामने होगा। लोगों में अकेले रहने की समझ और क्षमता, दोनों विकसित हुई है। अगर मैं अपनी बात करूं, तो मेरी दिनचर्या में कई तरह के सकारात्मक बदलाव हुए हैं। पहले रोज सुबह आधे घंटे घूमने जाता था। उसी बहाने पान भी खा लेता था।
अब घर में हूं तो योग, प्राणायाम और एक्सरसाइज से दिन की शुरुआत होती है। पान भी छूट गया है। ऊपर-ऊपर सब सामान्य दिखता है, लेकिन मन में एक बेचैनी-सी है। घर के इस कोने से उठकर उस कोने जाओ, किताब पढ़ो, फिर टीवी देख लो या कुछ देर व्हाट्सऐप चला लो।
घूम-फिरकर जिंदगी एक दायरे में सिमट गई है। असल में यही दायरा हमें हमारे होने का अहसास करा रहा है। कोरोना ने बहुत-सी बातों का विश्लेषण करने का बहाना भी दिया है। आजकल मैं अक्सर अपनी परिस्थितियों और महसूस होने वाले अभावों की तुलना करता हूं।
इसी प्रवृत्ति के चलते दिमाग में कुछ काल्पनिक विंब उभरते रहते हैं। बहुत दिनों से अपनी मां को संबोधित एक कवितानुमा चिठ्ठी लिखना चाह रहा हूं। कभी-कभी सोचता हूं कि अच्छा है, माता-पिता इस समय नहीं हैं। फिर ख्याल आता है कि कितना अच्छा होता कि वे लोग इस समय होते। यह भी जिंदगी की तुलनात्मक अनुभूति का एक हिस्सा है। इसे भी आजमाकर देखना चाहिए।
मुझे लगता है कि कोरोना का प्रकोप खत्म होने के बाद लोगों की सोच में फर्क आएगा। इस समय हमें आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के साथ खड़ा होना पड़ेगा। देश और समाज की तरक्की के लिए हर एक आदमी को जिंदा रखने की रखने की जरूरत है।