फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कोरोना वायरस: नहीं चाहिए जैविक युद्ध

राजीव त्यागी Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 19 Apr 2020 07:38 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरी दुनिया हलकान है। उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं से लैस देशों से लेकर दरमियाना या कामचलाऊ स्वास्थ सेवाओं वाले देश तक सभी इस दानव रूपी वायरस से त्रस्त हैं। इस बीमारी की वजह से पूरे विश्व में आर्थिक संकट के साथ बेरोजगारी और भुखमरी का आलम है। इस वायरस के संक्रमण से ताकतवर, कमजोर, अमीर गरीब सभी प्रभावित हैं। इस त्रासदी से उपजे हालात से हम सभी को बहुत कुछ सीखना चाहिए और आने वाले खतरों को लेकर पहले से ही सजग हो जाना चाहिए।



इस वायरस के संक्रमण से पैदा हुए हालात को देखकर हर तरफ एक ही चर्चा है, 'क्या मानव जाति जैविक आतंकवाद और जैविक हथियारों की मार को सहन कर सकती है?' जिसका उत्तर सिर्फ 'ना' है। जब-जब विश्व में उग्र राष्ट्रवाद उफान पर आया है, तब-तब मानव की सोच मानवीय आधार पर न रहकर स्व केंद्रित होती चली गई। जिन राष्ट्रों के पास युद्ध के बेहतर उपकरण और तकनीक हैं, वह कमजोर राष्ट्रों की सीमाओं का अतिक्रमण करके उनके संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं और यहीं से आतंक का जन्म होता है। आधुनिक काल के मानव ने वेदों की उस शिक्षा को भुला दिया जो 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत का प्रतिपादन करती है, जिसका अर्थ है कि पूरा विश्व एक परिवार है।


प्राकृतिक रूप से पनपे रोगजनक विषाणुओें की वजह से मानव जाति का बहुत नुकसान हुआ है। 1918 में पूरे विश्व में एच1 एन1 वायरस ने तांडव किया, जिसमें पांच करोड़ लोग मारे गए। वहीं विश्व इतिहास में ऐसी घटनाएं हैं, जिनमें एक राष्ट्र ने दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया। प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी और द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने अपने शत्रु राष्ट्रों के विरुद्ध जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया। पूरे विश्व से पोलियो एवं चेचक का खात्मा हो चुका है, परंतु बहुत से देशों के पास आज भी इन रोगों के रोगजनक जीवाणु सुरक्षित हैं। सोच कर देखिए यदि ये जीवाणु आतंकवादियों के हाथ में आ गए, तो क्या मानव सुरक्षित रह पाएगा?


जैविक हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के लिए विश्व बिरादरी ने अनेक संधियां की। 1874 में ब्रुसेल्स और 1899 का हेग का घोषणा पत्र तैयार किया गया और विषैले हथियारों का युद्ध में इस्तेमाल न करने का प्रण लिया गया। इसके पश्चात प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1925 में जिनेवा में एक और संधि हुई परंतु इस संधि को द्वितीय विश्व युद्ध के पहले तक अमेरिका और जापान ने मंजूर नहीं किया।


1969 में संयुक्त राष्ट्र के प्रयास के पश्चात वर्ष 1972 से राष्ट्रों ने एक और संधि पर हस्ताक्षर करना शुरू किया। जिस पर 1975 तक 183 देशों ने हस्ताक्षर करके यह माना कि पूरे विश्व में जैविक एवं रासायनिक हथियारों का युद्ध में बिल्कुल भी उपयोग नहीं होना चाहिए। हालांकि अभी तक इस संधि को इस्राइल, सूडान और नामीबिया जैसे देशों ने मंजूरी नहीं दी है। इन सभी संधियों में इस बात का कोई प्रावधान नहीं है कि यदि कोई देश चोरी छुपे रासायनिक एवं जैविक हथियारों का निर्माण करता है, तो उसके विरुद्ध सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी या उस राष्ट्र को ऐसा ना करने के लिए कैसे बाध्य किया जाएगा?


अतः समय का तकाजा है कि विश्व के सभी देशों को एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर करने चाहिए जिस संधि के द्वारा आतंक का पोषण करने वाले एवं जैविक हथियार बनाने वाले देशों का सभी तरह से बहिष्कार किया जा सके। जुलाई, 2018 में देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री दिवंगत मनोहर परिकर ने डीआरडीओ के कार्यक्रम में खुफिया एजेंसियों से प्राप्त सूचना के आधार पर कहा था कि आतंकवादी संगठनों द्वारा देश में जैविक और रासायनिक आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया सकता है।


देश के चुनिंदा जीव विज्ञानी, चिकित्सक, वैज्ञानिक, स्वास्थ संबंधी उपकरणों का निर्माण करने वाली कंपनियां पशु चिकित्सकों और औषधि विज्ञानियों की टीम का गठन करके जैविक आतंकवाद को रोकने की सभी प्रकार की रणनीति पर कार्य होना चाहिए।
विज्ञापन


सरकार को इस मद के लिए जैव रक्षा बजट का प्रावधान करना चाहिए। यह समय की मांग है कि हमारे देश में जैविक एवं रासायनिक हथियारों के खतरों के बारे में और हमले की स्थिति में बचाव के बारे में स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए। विभिन्न तरह के संचार साधनों का इस्तेमाल करके देश के नागरिकों को इसके बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। बचाव की बेहतर जानकारी होने से जैविक आतंकवाद की विभीषिका को कम किया जा सकता है।


महान दिनकर जी की इन पंक्तियों से हथियारों एवं युद्ध की विभीषिका समझी जा सकती हैः धरनी चीख कराह रही है, दुर्वह शास्त्रों के भारों से। सभ्य जगत को तृप्ति नहीं अब भी युगव्यापी संहारों से।

और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next