फौजदारी न्यायशास्त्र में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 न्यायालयों को यह विवेकाधिकार देता है कि वह किसी भी व्यक्ति के खिलाफ प्रकरण दर्ज होने पर यदि उसे जमानत के योग्य मानता है, तो उस दशा में उस अभियुक्त पर जमानत की ऐसी शर्त लगा सकता है, जिसे वह उचित समझता है।
अभी विगत कुछ समय में न्यायालयों ने जमानत की शर्तों में कुछ ऐसी शर्तें लगाई हैं, जिनसे जमानत पर छूटे व्यक्ति पर बंदिशों के अलावा उस व्यक्ति का लाभ समाज को मिल सके। उक्त आदेश इन न्यायाधीशों की नई सोच तथा लीक से हटकर आदेश देने की परंपरा को प्रतिबिंबित करता है।
इस कड़ी में एक दिलचस्प आदेश न्यायमूर्ति रोहित आर्य ने दिया है। इसमें ऐसे व्यक्ति की जमानत हेतु आवेदन पत्र पेश किया गया था, जिस पर फरियादी महिला के घर में घुसकर उसकी मर्यादा भंग करने का आरोप था।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित आर्य ने जमानत मंजूर करते हुए कहा कि अभियुक्त अपनी पत्नी के साथ इसी राखी वाले दिन (3 अगस्त, 2020 को) परिवादी महिला शारदा बाई के घर जाएगा तथा नेग देकर उनसे राखी बंधवाएगा तथा यथायोग्य उनकी रक्षा का वचन देगा। इसकी रसीद एवं फोटो उसे न्यायालय में पेश करनी होगी। इसके साथ ही उच्च न्यायालय द्वारा सामान्यतः जमानत हेतु लगाई जाने वाली छह अन्य शर्तें एवं प्रतिबंध भी लगाए गए।
इसी तरह इसी उच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने एक प्रकरण में आवेदक रामवीर को आदेश दिया कि वह जमानत पर छूटने के बाद दो वृक्ष लगाएगा तथा उसकी सुरक्षा हेतु बाड़ लगाने की भी व्यवस्था करेगा।
न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश एक परीक्षण के तौर पर दिए गए हैं, ताकि हिंसा और बुराई के विचार का प्रतिकार, सृजन एवं प्रकृति के साथ एकाकार होने के माध्यम से सामांजस्य स्थापित किया जा सके। न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में दया, प्रेम एवं करुणा की प्रकृति को विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि ये मानव जीवन की मूलभूत प्रवृत्तियां हैं।
अन्य जमानत के कुछ प्रकरणों में न्यायाधीश ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सेवाएं देने, आर्मी सेंट्रल वेलफेयर फंड में निर्धारित राशि जमा करने, प्रवासी मजदूरों की भलाई के लिए कलक्टर के समक्ष धन राशि जमा करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति आनंद पाठक के इन आदेशों की एक और विशेषता यह होती है कि जमानत आदेश अंग्रेजी में होते हैं, लेकिन अभियुक्त पर लगाई जाने वाली शर्तें हिंदी में होती हैं, ताकि वह उसे ठीक से समझ सके और उस पर अमल कर सके।
एक अन्य न्यायमूर्ति शील नागू ने भी अपने आदेशों में आरोपी को पेड़ लगाने तथा शिक्षा स्वयंसेवक बनने का आदेश दिया है। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि अभियुक्त अपना नाम अधिकारियों के पास 'कोविड वारियर्स' के रूप में पंजीबद्ध करवाए, ताकि समाज सुधार में उसकी सेवाओं का उपयोग किया जा सके।
न्यायमूर्ति नागू ने एक अन्य प्रकरण के दो अभियुक्त को स्थानीय अस्पताल में एक एल.ई.डी. टीवी लगाने का आदेश दिया और कहा कि उक्त टीवी चीन निर्मित न हो। इस संबंध में कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा इसी वर्ष बलात्कार के एक प्रकरण में अभियुक्त को जमानत का आदेश उल्लेखनीय है। इसमें दोनों पक्षों की सहमति से यह आदेश दिया गया था कि अभियुक्त फरियादी पीड़ित महिला से तीन माह में विवाह करेगा।
कुछ अन्य न्यायाधीशों ने भी विगत दिनों में लीक से अलग हटकर कुछ फैसले/आदेश दिए हैं, जो बताते हैं कि आने वाले समय में आदेश/निर्णय विधि सम्मत होने के साथ ही ‘लकीर के फकीर’ न होकर ‘लीक से हटकर’ होंगे। व्यक्ति विशेष को न्याय दिलाने के साथ ही यदि जमानती आदेश समाज की सेवा में अपना योगदान दे सकें, तो यह सोने पर सुहागा ही माना जाना चाहिए।
लेकिन इन जमानती आदेशों की सराहना करने के साथ ही हमें 1978 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मोतीराम विरूद्ध मध्यप्रदेश शासन में दिए गए फैसले तथा केरल हाई कोर्ट द्वारा इसी साल चिन्नाराव बनाम केरल राज्य वाले मामलों को भी ध्यान में रखना होगा, जिनमें जमानत आदेशों में नगद राशि जमा करवाने को न्यायोचित नहीं माना गया है। (लेखक मध्य प्रदेश के पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल हैं।)