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न्यायालय ने रास्ता दिखाया

अवधेश कुमार Published by: Raman Singh Updated Mon, 14 Jan 2019 06:23 PM IST
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अवधेश कुमार

देश में कई बार ऐसा वातावरण बनाया जाता है, मानो एक राज्य के निवासी ने दूसरे राज्य में रोजगार पाकर कोई अपराध कर दिया हो। पिछले दिनों हमने गुजरात में उत्तर प्रदेश एवं बिहार के लोगों पर हमले देखे। उसके बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का बयान आया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग नौकरियां पा लेते हैं, जिससे मध्य प्रदेश के नौजवान बेरोजगार रह जाते हैं, इसलिए जिन्हें प्रदेश में उद्योग और व्यवसाय के लिए रियायत चाहिए, उन्हें 70 प्रतिशत नौकरी स्थानीय लोगों को देनी होगी। पूर्वोत्तर में हिंदीभाषियों पर समय-समय पर होते हमले पूरे देश को दुखी कर जाते हैं। मुंबई और महाराष्ट्र का कुछ भाग तो उत्तर भारतीयों के लिए कुख्यात ही हो गया है।



यह समझ पाना कठिन है कि कोई व्यक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में अपनी योग्यता या क्षमता की बदौलत प्राप्त अवसर का उपयोग करने का अधिकारी क्यों नहीं हो सकता। अपने देश में ही राज्य की सीमा लांघने वालों के लिए परायेपन का भाव आत्मघाती है। ऐसे समय में यदि किसी प्रदेश का न्यायालय यह फैसला देता है कि अपने प्रदेश के लोगों के लिए नौकरियां आरक्षित करना असांविधानिक है, तो इससे यकीनन उम्मीद पैदा होती है। उत्तराखंड के नैनीताल उच्च न्यायालय ने ऐसा ही फैसला दिया है और उसने इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश को गलत ठहरा दिया है।


अनेक राज्यों ने सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए निश्चित सीमा तक पद आरक्षित किए हैं। कुछ नौकरियों के लिए तो राज्य के रोजगार या सेवायोजन कार्यालयों में पंजीयन की अनिवार्यता लागू है। दरअसल उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में एक्स-रे तकनीशियन के 45 पदों को भरने के लिए 15 अप्रैल, 2016 को एक विज्ञप्ति जारी की थी। दूसरे राज्य के कुछ लोगों ने उसके लिए ऑनलाइन आवेदन किया, पर उनका आवेदन यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया गया कि आपका प्रदेश के किसी भी सेवानियोजन कार्यालय में पंजीयन नहीं है। प्रशांत कुमार व अन्य ने उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई पहले एकल पीठ में हुई, जिसने सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण कराने के नियम को गलत ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर विचार करने के निर्देश सरकार को दिए। सरकार ने इस आदेश को बड़ी पीठ में चुनौती दी, जिसमें वर्तमान फैसला आया है। न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा कि संसद में कानून बनाए बिना कोई राज्य सरकार ऐसे कदम कैसे उठा सकती है?


संभवतः देश के किसी राज्य में ऐसा फैसला पहली बार आया है। साफ है कि जिस किसी भी राज्य ने स्थानीय लोगों के लिए सरकारी, अर्धसरकारी, स्वायत्त संस्थाओं या निजी क्षेत्रों में भी अपने राज्य के लोगों के लिए निश्चित सीमा तक पदों को आरक्षित किया है, वह असांविधानिक है। राज्य के रोजगार कार्यालयों में निबंधन की शर्त भी अवैध है। ये दोनों बाधाएं हट जाएं, तो किसी राज्य में रहने वाला व्यक्ति कहीं भी जाकर रोजगार पा सकता है। नैनीताल उच्च न्यायालय ने एक रास्ता दिया है। इसके आधार पर दूसरे राज्यों में ऐसे शासनादेश को चुनौतियां दी जा सकती हैं।

 

इस तरह का भेदभाव संकीर्ण क्षेत्रीयता पैदा करता है, जो भारत जैसे विविधताओं वाले देश की एकता के लिए खतरनाक है। इस तरह उच्च न्यायालय के फैसले को हम संघीय एकता को सशक्त करने वाला भी कह सकते हैं।

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