खैर, इनके अलावा भी हाल के दिनों में दो अलग-अलग ऐसी घटनाएं हुईं, जिनमें दो नायक साहस को मन में रखकर कुछ करने की ठान चुके थे। लेकिन उनका जिक्र करने से पहले क्यों न यह समझें कि आखिर साहस होता क्या है? भय को जीतना ही, या और भी कुछ? क्या साहस अपने साथ करुणा भी लेकर आता है? हाल के नैतिक दर्शन में शारीरिक साहस, नैतिक साहस और सहानुभूतिपूर्ण साहस जैसी चीजों के बीच एक उपयोगी अंतर बताया गया। सहानुभूतिपूर्ण साहस से तात्पर्य है, उस दुख को महसूस करना, जो चाहे अपना हो या किसी और का, उसका सामना करने के लिए तैयार रहता है। जब साहस अपने साथ करुणा का मूल्य लिए आता है, फिर कोई सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ता। प्लेटो ने भी यह समझाया कि साहस सिर्फ निडरता नहीं है, बल्कि एक तरह का ज्ञान है कि असल में किस चीज से डरना चाहिए और किससे नहीं, और प्रतिकूल परिस्थिति में कैसे डटे रहना चाहिए, क्योंकि साहसी व्यक्ति अच्छाई के गुणों से ही प्रेरित होता है। उन दोनों नायकों को शायद उस अच्छाई की समझ थी और उस साहस का ज्ञान भी था।
उन दोनों ने यह बताने की कोशिश की कि साहस का मूल्य अपने साथ करुणा का मूल्य भी लेकर आता है, जो एक व्यक्ति को वास्तविक रूप से साहसी कहलाने के काबिल बनाता है। आपको वह तालाब वाली घटना तो याद ही होगी, जिसमें एक लड़के की नजर बार-बार अपने गांव के उस तालाब पर जाती है, जिसे दूसरों ने कचरा डालने की जगह बना दिया था। उस लड़के का तालाब को देखना बस यों ही नहीं था। वह कुछ और देख रहा था, कुछ ऐसा करने की सोच रहा था, जैसा आज तक किसी ने नहीं किया। वह मानो स्वच्छता की कहानी फिर से याद कराना चाह रहा था और यह भी कि करुणा लिए आंखों से देखना दूसरों की परेशानियों को समझने का पहला पायदान होता है और उसे दूर करने की जिजीविषा साहस। खैर, वह तालाब गंदगियों को अपने अंदर समेट रहा था और अधिकार की गुहार लगाते उन नागरिकों को उस कर्तव्य की भी याद दिलाना चाह रहा था, जो हर बात पर सिस्टम को ही दोषी ठहराते हैं। उधर वह गंदगी से भरा तालाब उस लड़के को दूर रहने की सलाह दे रहा था, लेकिन वह लड़का मानो महात्मा गांधी के जंतर को याद कर रहा था।
आखिरकार वह उस तालाब में उतर पड़ा, जबकि शहर के अपार्टमेंट्स में न जाने कितने युवा और बच्चे किसी स्विमिंग पूल में उतर रहे थे, क्योंकि वे तैरना सीख रहे थे या गर्मी से निजात पाना चाह रहे थे। उनके लिए किसी शहर या गांव के गंदे तालाब धुंधले और मौन थे। उन्हें संविधान में उल्लिखित अधिकारों की बखूबी जानकारी थी, पर स्वच्छता की संवेदना से उनका शहर कोसों दूर था और वह नागरिक कर्तव्य भी। उधर वह युवा उस तालाब को गंदगी से मुक्त कराने के लिए उतर रहा था, क्योंकि साहस भय को पछाड़कर उससे आगे बढ़ने का मूल्य होता है। वह आगे बढ़ना उन तमाम लोगों के दुखों को कम करने का एक साहसिक कदम होता है। बस कुछ यही महसूस कर वह भी उतर पड़ा, ताकि उसके गांव के लोगों को साफ-सुथरा पानी मिल सके और जानवरों को भी स्वच्छ जल नसीब हो। अपने नाम के माफिक उसने उस अजनार नदी के पानी में तबाही मचा दी। आखिरकार वह बिट्टू तबाही के नाम से जाना भी तो जाता था।
पूरे सात महीने तक वह पानी में उतरता रहा, और तब तक नहीं रुका, जब तक पूरा तालाब साफ नहीं हो गया। अधिकार से ज्यादा कर्तव्य को निभाता हुआ मध्य प्रदेश का वह लाल सुरेंद्र सिंह चौधरी, यानी बिट्टू तबाही पानी को वापस नीले रंग में रंग चुका था। उधर नीले आकाश में अंधेरा छा चुका था। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में लगभग 174 लोग सवार थे। उस प्लेन के सह-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया। विमान तेजी से नीचे गिरने लगा। गंभीर घाव और बहुत ज्यादा खून बहने के बावजूद, मच्छार कॉकपिट के दरवाजे तक पहुंचे और उसे खोल दिया, ताकि यात्री और क्रू अंदर आ सकें, हमलावर को काबू में कर सकें और जेट को सऊदी अरब के तबुक में इमरजेंसी लैंडिंग कराने में मदद कर सकें। लोगों का मानना है कि उनके इस काम ने हवा में होने वाली एक बड़ी दुर्घटना को रोक दिया। लेकिन कैप्टन स्मित के पास साहस के साथ करुणा का मूल्य था, उन 174 यात्रियों को बचाने के लिए वह बहता लहू भी था, जो उसे कॉकपिट के बटन को दबाने का हौसला दे रहा था। कोई पानी में इसलिए उतरा, क्योंकि वह अपने गांव के लोगों व पशु-पक्षियों को साफ पानी पहुंचाने में अपनी कर्तव्यनिष्ठता को साहस और करुणा से महसूस कर रहा था, तो कोई हवा में रिसते लहू के बावजूद अपनी जान से ज्यादा हवाई जहाज में बैठे तमाम यात्रियों को बचाने के लिए जी-जान लगा रहा था।
दोनों खुद के बारे में नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों के बारे में सोच रहे थे, जो पानी और लहू के रंग से ज्यादा गहरे थे और उस साहस को करुणा का रंग दे चुके थे।
आखिर बिट्टू और कैप्टन स्मित करुणा संग साहस लिए असाधारण मनुष्य जो बन चुके थे। करुणा को लिए वह साहस जीत चुका था और बहुत कुछ बचा भी ले गया। कइयों की जान और पानी का नीला रंग भी। और उधर वे मांएं भी अपने परिवार के लिए दौड़ पड़ी थीं, कोई मैराथन में, कोई होमगार्ड की परीक्षा में। सब अपनी जान जोखिम में डाल कर बताना चाह रहे थे कि दुनिया में साहस बिन करुणा के अधूरा है। सभी अपने साहस के मूल्य को करुणा संग उस जल में, उस रक्त में, उस आकाश में, उस जमीं पर उतार चुके थे। आखिरकार यही तो साहस है, करुणा संग, उस भय से आगे निकल जाना।