तेरी ही खातिर सजे रंग अबीर के थाल,
तेरे आने से हुई मेरी होली लाल।
रंग पर्व में घुल गए इंतजार के रंग,
होली सच में शोभती अपनों के ही संग।
सरसों टेसू और पलाश हैं बसंत के दूत,
रंग रूप से कर रहे मादकता आहूत।
लज्जा तेरा रंग है, मेरा रंग संकोच,
ऐसे में कैसे मने होली तू ही सोच।
मुझको अब भी याद है वो होली वो फाग,
तन पर रंग था प्रीत का मन में प्रीत की आग।
मां तेरे हाथों बनी गुझिया का वो स्वाद,
लगता हर पल साथ है तेरा आशीर्वाद।
पिचकारी थी पांच की दस पैसे का रंग,
दिनभर हम भी गांव में करते थे हुडदंग।
मन में संशय न रहे खुले-खुले हों बंध,
नेह छोह के पुष्प से निकले मादक गंध।
हुलस उलस इतरा रहे गोरी तेरे अंग,
मेरे मन बजने लगे ढोल मजीरा चंग।
गोरी फागुन रच रहा ये कैसा षडयन्त्र,
तू कानो में फूंकती आज मिलन के मन्त्र।
खेत बगीचे देखिये फैले कितने रंग,
फागुन होली खेलता आज प्रकृति के संग।
बैरी फागुन ले उड़ा बड़े बड़ों के होश,
भांग ठंडई का नहीं इसमें सारा दोष।
रंग लगाने के लिए न मुहूर्त न काल,
खुला निमंत्रण दे रहे साफ सुथरे गाल।
गलियां मंदिर घाट सब होली में गुलजार,
आज मसाने में सजा बाबा का दरबार।
कौन जोगीरा गा रहा सारा रारा राग ,
बाहर बाहर भींगना भीतर भीतर आग।