फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अब यह देश प्रतीक्षा नहीं करता: भारत का जवाब अब सिर्फ शब्दों में नहीं, लोकतंत्र पर उपदेश पश्चिम की पुरानी आदत

Sat, 15 Aug 2026 11:28 AM IST
ज्योति भास्कर आदित्य राज कौल, वरिष्ठ रक्षा पत्रकार और ‘धुरंधर’ के रिसर्च कंसल्टेंट।

सार

भारत अब कूटनीति की मेज के किनारे प्रतीक्षा नहीं करता; उसकी शर्तें तय करने में शामिल होता है। पुरानी आदत के चलते पश्चिम अब भी हमें लोकतंत्र पर उपदेश देता है। पर, भारत का जवाब अब सिर्फ शब्दों में नहीं है। यह हमारी युवा पीढ़ी है, जो अपने भविष्य का निर्माण, प्रक्षेपण व संचालन खुद कर रही है।
विज्ञापन
स्वतंत्रता दिवस - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई-एजेंसी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आज भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है और साथ ही अपनी नियति से आठ दशकों के संघर्ष का हिसाब भी कर रहा है। हर वर्षगांठ उत्सव का अवसर होती है; यह वर्षगांठ आत्ममंथन का भी अवसर है, उन लड़ाइयों का, जो हमने अपनी सीमाओं के भीतर व बाहर लड़ीं; उस कीमत की, जो आजादी के लिए चुकाई गई, जिसे अब हम सहज मान बैठे हैं; और उस दूरी की, जो एक कमजोर नवजात गणराज्य से एक ऐसी सभ्यता तक तय हुई, जो एक बार फिर अपने स्वरों में बोलती है।

विज्ञापन


कभी ऐसा भी समय था, जब पश्चिमी कल्पना में भारत को महज एक कौतूहल बना दिया गया था, उसे सपेरों का देश तथा गरीबी की पहचान समझा जाता था और जिसकी संभावनाओं पर संदेह किया जाता था। पश्चिमी यात्री भारत से निराश होने की उम्मीद लेकर आते थे। अक्सर वैसा होता भी था। कूटनीति की उच्च मेज पर हमारी कोई जगह नहीं थी; बहुत हुआ, तो हमें उसके किनारे खड़े रहने की इजाजत थी, नीति में गुटनिरपेक्ष, सच कहें, तो सत्ता से पूरी तरह असंबद्ध। दुनिया की दिशा कहीं और तय होती थी। भारत बस देखता और प्रतीक्षा करता रहा।

लेकिन, अब वह भारत नहीं रहा। आज का भारत गुटनिरपेक्ष नहीं, बहु-संरेखित है, जिसे अब मनाया जाता है, जो मनाता नहीं। हम दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, और जब हम किसी देश के साथ आर्थिक संबंध गहरे करने का फैसला करते हैं, तो वह रिश्ता सिर्फ हमारा नहीं, उनका भी भविष्य गढ़ता है। अब हम मेज के किनारे प्रतीक्षा नहीं करते; उसकी शर्तें तय करने में शामिल होते हैं। पुरानी आदत के चलते पश्चिम अब भी हमें लोकतंत्र पर उपदेश देता है। पर, भारत का जवाब अब शब्दों में नहीं है, यह हमारी युवा पीढ़ी है, जो अपने भविष्य का निर्माण, प्रक्षेपण व संचालन खुद कर रही है। भारतीय निजी उद्यम अब अंतरिक्ष तक पहुंचते हैं, बिना सरकार की अनुमति या खजाने की प्रतीक्षा किए। जिस पीढ़ी को कभी बेचैन कहकर खारिज किया जाता था, वह आज उस सदी की नींव रख रही है, जिसे शायद भारत की सदी के रूप में याद किया जाएगा।
विज्ञापन


यह सब बिना कीमत चुकाए नहीं मिला। लगभग चार दशकों तक, स्वतंत्र भारत के जीवन का आधा हिस्सा, इस देश ने एक ऐसा युद्ध लड़ा है, जो कभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं हुआ: जम्मू-कश्मीर और उसके बाहर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद। पुलवामा से पहलगाम तक, इन हमलों का मकसद कभी सिर्फ नागरिकों को मारना और भय फैलाना नहीं था। उद्देश्य था भारत को धीमा करना, एक उभरती हुई शक्ति को उसके ही खून में डुबो देना, इससे पहले कि वह और ऊंचा उठे। पाकिस्तान, जो अपनी जनता को गरीबी से बाहर नहीं निकाल सका, उसने इसके बजाय हमारी धरती पर अराजकता निर्यात करना चुना। यह रणनीति अनुत्तरित नहीं रही।
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, उरी हमले के बाद, और 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक, पुलवामा हमले के बाद, एक नए जवाबी सिद्धांत की घोषणाएं थीं। पर, पहलगाम की कायरतापूर्ण घटना के बाद 2025 का ऑपरेशन सिंदूर एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ-यह प्रमाण कि भारत के धैर्य की एक सीमा है, पर उसकी पहुंच की नहीं। रावलपिंडी के निकट एक ठिकाने का धधकना, वह दृश्य है, जिसे पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान जल्दी नहीं भूल पाएगा। भारत की मंशा यही है कि वह भूल भी न पाए।

इस बाहरी सतर्कता के साथ-साथ, भीतर भी एक बड़ा फैसला हुआ। 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाने से उस मनगढ़ंत अलगाववाद का अध्याय बंद हुआ, जिसने तीन दशकों से अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर की पहचान तय की थी, और विकास व रोजगार के अवसरों की ओर एक धीमा, असमान, मगर वास्तविक रास्ता खुला। दशकों की उपेक्षा के बाद जम्मू-कश्मीर में रातोंरात बदलाव संभव नहीं था, पर यह अब शुरू हो चुका है।
इसी बीच, रेड कॉरिडोर के जंगलों और दुर्गम इलाकों में एक और युद्ध चुपचाप करवट ले रहा था। वर्षों तक बस्तर, माओवादी हिंसा से बनाए गए एक स्वघोषित ‘मुक्त क्षेत्र’ की राजधानी बना रहा, जिसकी कीमत सुरक्षाबलों और निर्दोष ग्रामीणों, दोनों की जान से चुकाई गई। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार और आंध्र प्रदेश में यह विद्रोह अब रीढ़ से टूट चुका है। जो बचा है, वह ताकत से ज्यादा स्मृति के सहारे टिकी एक धुंधलाती प्रतिध्वनि मात्र है और यह समय की बात है कि नक्सलवाद केवल इतिहास की किताबों में सिमट जाए।

भारत ने दुनिया के लिए खुद को खोला, हिचकिचाहट से नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के उस प्राचीन विश्वास के आत्मविश्वास से, कि यह दुनिया एक परिवार है। आज कई देश भारत के साथ व्यापार समझौतों और साझेदारियों के लिए कतार में खड़े हैं, केवल उसके बाजार तक पहुंच के लिए नहीं, बल्कि इसलिए, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि भारत अपनी बात निभाएगा। संघर्षों और अनिश्चितता से टूटी हुई दुनिया में, भारत एक महाशक्ति से भी दुर्लभ चीज बन गया है, एक भरोसेमंद शक्ति। आज, अपने इतिहास में पहली बार, लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा, इसकी रचना के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर। यह महज एक गीत नहीं है। यह एक नवीनीकृत प्रतिज्ञा है कि जिस सभ्यता को कभी गरीबी व विखंडन की नियति मान लिया गया था, वह अपनी शर्तों पर, अपने समय में टिकी रही, फिर से खड़ी हुई, और ऊंची उठी।

अस्सी वर्ष गर्व करने के लिए काफी लंबे हैं, और यह याद रखने के लिए काफी कम कि इसकी कीमत क्या चुकाई गई। उरी, बालाकोट और पहलगाम की छाया में डटा हर सैनिक; बस्तर के जंगलों में गश्त करने वाला हर पुलिसकर्मी, हर वह साधारण नागरिक, जिसने गणराज्य के अनिश्चित दशकों में भी उस पर विश्वास बनाए रखा, वे ही कारण हैं कि यह वर्षगांठ केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि एक कर्ज है, जिसे हम ढो रहे हैं।
इसलिए, आज हम सिर्फ झंडा नहीं फहराते। हम झुकते हैं, इस मिट्टी के आगे, इस बलिदान के आगे, और उस मां के आगे, जिसने हमसे बस इतना ही मांगा कि हम उस पर विश्वास करें।

विज्ञापन

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वंदे मातरम्।
वंदे मातरम्। जय हिंद।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें