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उनके भी श्रम की कीमत

ऋतु सारस्वत Published by: Raman Singh Updated Wed, 30 Jan 2019 06:43 PM IST
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ऋतु सारस्वत

हाल ही में ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में हर साल महिलाएं 700 लाख करोड़ रुपये के ऐसे काम करती हैं, जिनका उन्हें मेहनताना नहीं मिलता। भारत में यह आंकड़ा छह लाख करोड़ रुपये का है। दुनिया भर में महिलाओं को लेकर एक ही सोच है कि उनका काम घर-परिवार की देखभाल करना है। इस सोच पर 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में अहम टिप्पणी देते हुए कहा था कि एक महिला बिना कोई भुगतान लिए घर की सारी देखभाल करती है। उसे होम मेकर (गृहिणी) और बिना आय वाली कहना सही नहीं है। महिला सिर्फ एक मां और पत्नी नहीं होती, वह अपने परिवार की वित्त मंत्री और चार्टर्ड अकाउंटेंट भी होती हैं। न्यायालय ने यह टिप्पणी पुडुचेरी बिजली बोर्ड की उस याचिका के संदर्भ में की थी, जिसमें बोर्ड को बिजली की चपेट में आकर मारी गई एक महिला को क्षतिपूर्ति के तौर पर चार लाख रुपये देने थे, जो कि बिजली बोर्ड को इसलिए स्वीकार नहीं थे, क्योंकि महिला एक गृहिणी थी और उसकी आय नहीं थी। न्यायालय ने बोर्ड की याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा था कि हमें खाना पकाना, कपड़े धोना, सफाई करना जैसे रोजाना के कामों को अलग नजरिये से देखने की जरूरत है।



एक राष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक, 40 प्रतिशत ग्रामीण और 65 प्रतिशत शहरी महिलाएं पूरी तरह घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं। उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आंकड़ों के हिसाब से 60 से ज्यादा की आयु वाली एक चौथाई महिलाएं ऐसी हैं, जिनका सबसे ज्यादा समय घरेलू कार्य करने में ही बीतता है। पितृसत्तात्मक समाज में यह तथ्य गहरी पैठ बनाए हुए है कि स्त्री का जन्म सेवा कार्यों के लिए ही हुआ है। माउंटेन रिसर्च जर्नल के एक अध्ययन के दौरान उत्तराखंड की महिलाओं ने कहा कि वे कोई काम नहीं करतीं, पर विश्लेषण में पता चला कि परिवार के पुरुष औसतन नौ घंटे काम कर रहे थे, जबकि महिलाएं 16 घंटे। अगर उनके काम के लिए न्यूनतम भुगतान किया जाता, तो पुरुष को 128 रुपये और महिला को 228 रुपये मिलते।


कुछ देशों एवं संस्थानों ने घरेलू अवैतनिक कार्यों का मूल्यांकन करने के लिए कुछ विधियों का प्रयोग शुरू किया है। इन विधियों में से एक टाइम यूज सर्वे है। यानी जितना समय महिला घरेलू अवैतनिक कार्यों को देती है, यदि उतना ही समय वह वैतनिक कार्य के लिए देती, तो उसे कितना वेतन मिलता। कई देशों ने अवैतनिक कार्यों की गणना के लिए मार्केट रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी का भी इस्तेमाल किया है। यानी जो कार्य अवैतनिक रूप से गृहिणियों द्वारा किए जा रहे हैं, यदि उन सेवाओं को बाजार के माध्यम से उपलब्ध कराया जाए, तो कितनी लागत आएगी। संयुक्त राष्ट्र के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सोशल डेवलपमेंट से जुड़े डेबी बडलेंडर ने द स्टैटिस्टिकल एविडेंस ऑन केयर ऐंड नॉन केयर वर्क अक्रॉस सिक्स कंट्रीज नामक अपने अध्ययन में, अर्जेंटीना, भारत, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, निकारागुआ, दक्षिण अफ्रीका तथा तंजानिया का अध्ययन करने के लिए टाइम यूज सर्वे विधि का प्रयोग कर पाया कि अर्जेंटीना में जहां प्रतिदिन पुरुष 101 मिनट और महिला 293 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं, वहीं भारत में पुरुष प्रतिदिन 36 मिनट और महिलाएं 354 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं। दुनिया भर में कुल काम के घंटों में से महिलाएं दो तिहाई घंटे काम करती हैं, पर वह केवल 10 प्रतिशत आय ही अर्जित करती हैं और वे विश्व की मात्र एक प्रतिशत संपत्ति की मालकिन हैं।


एक स्वस्थ और लोकतांत्रिक समाज की स्थापना तब तक संभव नहीं, जब तक देश के हर नागरिक के आत्मसम्मान का संरक्षण न किया जाए। इस दृष्टि से घरेलू महिलाओं के श्रम का अवमूल्यन किसी भी दृष्टि से उचित नहीं।

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