फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सिर्फ कानून से नहीं रुकेगा भ्रष्टाचार

Mon, 10 Feb 2014 07:34 PM IST
विनीत नारायण
विज्ञापन
विज्ञापन
इस देश के हर आम और खास आदमी को पता है कि देश में हो रहे अपराधों को रोकने के लिए सैकड़ों कानून हैं। पुलिस है, सीबीआई है, और नीचे से ऊपर तक न्यायिक तंत्र का जाल है, पर क्या इसके बावजूद समाज में अपराध घट रहे हैं? नहीं, फिर भी लोगों को लगातार बहकाया जा रहा है कि सख्त कानून से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। जबकि अपराध शास्त्र के शोध बताते हैं कि कानून से केवल पांच फीसदी अपराध कम होते हैं। बाकी 95 फीसदी अपराध कम करने के लिए अन्य प्रयासों की जरूरत होती है। भ्रष्टाचार भी चूंकि एक अपराध है, इसलिए इसे समाप्त करने से पहले हमें समझना होगा कि यह अपराध क्यों हो रहा है।
विज्ञापन


जहां तक ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार का सवाल है, तो उसे अपराध शास्त्र की भाषा में ‘व्हाइट कॉलर क्राइम’ कहते हैं और इसकी परिभाषा यह है कि ‘वह अपराध, जिसे पकड़ा न जा सके’ यानी ताकतवार लोगों के भ्रष्टाचार को पकड़ना आसान नहीं होता। देशभर में राजनीति, प्रशासन, उद्योग और व्यापार से जुड़े ऐसे करोड़ों उदाहरण हैं, जहां बिना मेहनत के अकूत धन-संपदा जमा कर ली गई है। लोग जानते हैं कि यह संग्रह भ्रष्ट तरीकों से किया गया है। फिर भी अपराध करने वाले इन लोगों को पकड़ा नहीं जाता।

दरअसल भ्रष्टाचार के दो कारण हैं। एक-प्रवृत्ति और दूसरा-परिस्थिति। प्रवृत्ति और परिस्थिति जितनी प्रबल होगी, उतना ही उसे रोकने का कानून अप्रभावी होगा। प्रवृत्ति आती है, व्यक्ति के संस्कारों से और परिस्थितियां ऐसे हालात हैं, जो एक आदमी को भ्रष्ट बनने का मौका देते हैं। अगर प्रवृत्ति सादा जीवन उच्च विचार की होगी, तो व्यक्ति भ्रष्ट आचरण करने से बचेगा। आज हम लोगों को यह बता रहे हैं कि खुशी पाने का तरीका है, रोज नई खरीदारी करते जाना। चाहे वह कार के नए मॉडल हों या अन्य कोई सामान। बाजार की सभी शक्तियों, उनकी विज्ञापन एजेंसियों का एक ही मकसद है, लोग खरीदारी करें, ताकि उनके उत्पादों का व्यापार बढ़े। फिर चाहे वह संपत्ति हो, उपकरण हों या फिर सोना चांदी।
विज्ञापन


इसी तरह भूख और हवस को भी लगातार हवा दी जा रही है, जिससे सामाजिक और आर्थिक असंतुलन पैदा हो रहा है। नतीजा यह है कि लोग अनैतिक साधनों से अपनी इन कृत्रिम आवश्यकताओं को पूरा करने में संकोच नहीं करते और भ्रष्टाचार का पोषण करने लगते हैं। इसके साथ ही मौजूदा समाज में नैतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास हो रहा है। आज समाज के आदर्श ज्ञानी, त्यागी या सिद्ध पुरुष नहीं हैं, बल्कि जिसके पास अकूत धन और ताकत है, उसी का बोलबाला है। कहा जाता है, जिसकी लाठी, उसी की भैंस। वही धार्मिक, सामाजिक व शैक्षिक कार्यों को सहायता देता है और यश कमाता है। उसे देखकर हर व्यक्ति वैसा ही बनना चाहता है। समझना मुश्किल नहीं, अगर हालात ऐसे रहेंगे, तो भला भ्रष्टाचार कैसे कम होगा?

जो लोग सख्त कानून बनाकर भ्रष्टाचार रोकने की बात कर रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि दुनिया में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब सख्त कानूनों का विपरीत असर पड़ा है। फ्रांस के एक राजा ने मुनादी करवाई कि जेबकतरों को सरेआम फांसी दी जाएगी। अपेक्षा यह थी कि फांसी के डर से जेबकतरे जेबें नहीं काटेंगे। पर जब किसी अपराधी को सार्वजनिक रूप से फांसी दी जाती थी, तो तमाशबीन लोगों की दर्जनों जेबें कट जाती थीं।

मतलब साफ था कि फांसी पर लटकते हुए देखकर भी जेबकतरों के मन में डर पैदा नहीं होता था। यही बात भ्रष्टाचार विरोधी कानून की भी है। पिछले तीन बरस के हल्ले को छोड़कर अगर पीछे जाएं, तो पाएंगे कि मौजूदा कानून में ही एक क्लर्क से लेकर प्रधानमंत्री तक को पकड़ने की क्षमता थी। अगर उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ, तो इसकी वजह कानून की कमी नहीं, बल्कि उसे लागू करने वालों की प्रवृत्ति है। यह समझना होगा कि कानून की भी भूमिका केवल प्रतिरोध करने तक होती है, समाधान देने की नहीं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध केवल कानून बनाने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। जो लोग कानून का मुद्दा पकड़कर तूफान मचा रहे हैं, वे भी मन में जानते हैं कि यह तो एक बहाना है, असली मकसद तो सत्ता पाना है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें