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जमीन पर काम करने का सबक

मल्लिका गोयल Published by: योगेश साहू Updated Tue, 12 May 2020 05:26 AM IST
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मजदूरों को भोजन सामग्री देते समाजसेवी संगठन के सदस्य। - फोटो : prayagraj

'मुझे हमेशा हैरत होती थी कि किसी चीज के बारे में कोई कुछ करता क्यों नहीं। बाद में मुझे एहसास हआ कि यह कोई मैं खुद थी।' - लिली टॉमलिन



देशव्यापी लॉकडाउन ने समाज के हर तबके को बेचैन कर दिया है। उच्च वर्ग के शहरी युवाओं के लिए ऊब सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। जब हमारे आसपास लाखों लोग अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इस ऊब के क्या मायने हैं? हमने सोचा कि क्यों न कुछ किया जाए, हम भले ही दुनिया नहीं बदल सकते, मगर कहीं से शुरुआत तो कर ही सकते हैं।


इसी विचार से प्रोजेक्ट पनाह का जन्म हुआ, जो दिल्ली में शरणार्थियों के आर्थिक और सामाजिक कल्याण को प्रोत्साहित करने वाली एक पहल है। हमने दो चरणों में फंड तथा राशन जुटाया और पिछले दो महीने से करीब चार सौ लोगों में प्रभावी तरीके से इसका वितरण कर रहे हैं। ऐसा करते हुए हमने कई सबक सीखे हैं। इसने हमारी पूर्व धारणाओं को बदलने को मजबूर किया।

  1. समस्या की शिनाख्त और शुरुआतः हमें पता था कि रोज कमाने वाले श्रमिक बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, लेकिन हमें पता नहीं था कि उन तक मदद कैसे पहुंचाएं। थोड़े से शोध से हमें पता चला कि रोहिंग्या शरणार्थी व्यापक रूप से दैनिक कमाई पर निर्भर हैं और अपनी राज्यविहीन हैसियत के कारण सरकारी राहत तक उनकी पहुंच नहीं है। दिल्ली में इस वर्ग के अधिकांश लोग कालिंदी कुंज की बस्तियों में रहते हैं। हमने इसमें से सर्वाधिक जरूरतमंद समूह का चयन किया और काम किया।
  2. दूसरों की करुणा पर विश्वास करेंः जब हमने लोगों से फंड के लिए बात की, तो शरणार्थियों के खिलाफ अक्सर जताई जाने वाली सामाजिक-राजनीतिक आपत्तियों के कारण हमें लग रहा था कि विरोध का सामना करना पड़ेगा। पर लोगों ने अपनी राजनीतिक मान्यताओं से इतर उत्साहपूर्वक दान दिया।
  3. भीड़ में भी कई चेहरेः इस पहल में जमीनी स्तर की इस सबसे बड़ी सच्चाई से हम रूबरू हुए। हमारे देश में गरीबी हर जगह नजर आती है, इसके बावजूद उच्च और निम्न वर्ग के बीच संवाद की कमी हैरान करने वाली है। हालत यह है कि हम या तो गरीबों को बेबस और कमजोर मानते हैं या फिर धूर्त चोर। इस अनुभव ने दिखाया कि वे भी हमारे जैसे हैं और उनका भी अपना व्यक्तित्व है। एक वृद्धा ने कहा, 'हम चार पैक ले जाएंगे।' जबकि प्रत्येक पैकेट तीस किलोग्राम के थे। हमने उससे कहा कि एक परिवार के लिए एक पैकेट है, तो वह बेमन से तैयार हुई। कुछ श्रमिकों ने गौर किया कि हम कुछ दूरी से पैकेट बांट रहे हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों ने कहा कि यदि कमी होगी, तो वे आपस में बांट लेंगे। यह दिल को छू लेने वाली बात थी, जिसने हमें सिखाया कि उदारता समृद्धि से बंधी नहीं हो सकती। इसने हमारी इस धारणा को मजबूत किया कि धर्म जैसे कृत्रिम विभाजन के बावजूद शांतिपूर्ण सहअस्तित्व ही आगे बढ़ने का रास्ता है।
  4. अधिकारी शत्रु नहींः हमें पता था कि दिल्ली पुलिस की अनुमति के बिना हमें शरणार्थी बस्ती में जाने नहीं दिया जाएगा। इसलिए हमने थाना प्रभारी को फोन कर मदद मांगी। वह न केवल उत्साह बढ़ाने वाले थे, बल्कि उन्होंने हमारी पहल को पूरा समर्थन दिया।
  5. यह इतना जटिल नहींः हमने जब मदद करने का मन बनाया, तो चीजों का अपना ढंग था। बेशक इसमें कठोर परिश्रम लगता है, पर आगे बढ़ना इतना भी जटिल नहीं था। हमें जिस सबसे बड़ी बाधा को पार करना पड़ा, वह हमारी खुद की मानसिकता थी कि ऐसे हालात में हम कुछ नहीं कर सकते।
  6. छोटी सी मदद भी काम कीः आज का युवा इतना भावुक और दृढ़ है कि वह बदलाव ला सकता है, लेकिन आत्म विश्वास की कमी के कारण वह पीछे हट जाता है। हर छोटी सी मदद भी मायने रखती है और हमारे छोटे-छोटे कार्य भी आसपास के लोगों की जिंदगी बेहतर कर सकते हैं, हम उम्मीद करते हैं कि और अधिक युवा उन बातों के लिए आगे आएंगे, जिन पर वे यकीन करते हैं। (- अलिजा अली, मल्लिका गोयल और नयनिका गुप्ता के प्रोजेक्ट पनाह ने सैकड़ों शरणार्थियों तक आवश्यक चीजें पहुंचाईं।)
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