कोविड-19 महामारी का सबसे ज्यादा प्रभाव मजदूर वर्ग पर पड़ा है, जो अपने गांव-घर से दूर रोटी कमाने की दौड़ में शामिल होकर शहर की ओर आया। उसकी आंख में अनगिनत सपने थे और उन सपनों की अपनी भाषा। साल दर साल वह इस बारहखड़ी में उलझा रहा कि इन बहुमंजिली इमारतों में, जिन्हें वह अपने खून-पसीने से सींचकर खड़ा करता है, शायद विपदा आने पर उसे भी बसेरा मिलेगा।
महामारी के इस दौर में शहरों की संवेदनहीनता का जो चित्र सामने आया, वह भयानक, लेकिन प्रवासी कामगारों के जीवन का कड़वा सच है। अनगिनत प्रवासी कामगार शहरों से गांवों की ओर अपनी गृहस्थी की पोटली सिर पर उठाए पैदल ही मीलों लंबी यात्रा करने के लिए विवश हुए। उनके सामने अपनी जड़ों की ओर लौटना ही एकमात्र सहारा बचा।
ऐसे परिदृश्य भयावह होने के साथ-साथ समाज की उस व्यक्ति के प्रति निर्ममता उसके रोजगार को ही नहीं, उस वर्ग के कौशल को भी प्रभावित करते हैं। यही वक्त है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपने स्तर पर इन प्रवासी कामगारों की, चाहे वे शिक्षित हों, अर्द्धशिक्षित हों या अशिक्षित, कौशल मानचित्रण (स्किल मैपिंग) करवाएं, ताकि देश का हुनर देश के काम आ सके।
आज यदि हम विकसित देशों पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि वहां की कार्य संस्कृति व्यक्ति की कौशलपरक गुणवत्ता पर आधारित है, न कि उनकी डिग्रियों पर। गूगल तथा फेसबुक पर अनेक ऐसे नवयुवक काम कर रहे हैं, जो किसी नामी संस्थान से अध्ययन करके नहीं आए, बल्कि उनका चयन उनकी कार्यकुशलता के आधार पर किया गया है।
इसी प्रकार विदेशों में अनेक प्रसिद्ध होटलों में भारतवंशियों ने अपनी निपुणता के कारण पहचान बनाई है। हमें भी ऐसी मुहिम की शुरुआत कर अपनी कार्य संस्कृति में बदलाव करने होंगे। उदाहरण के लिए, बिहार ऐसा प्रदेश है, जिसके कुशल मजदूर देश के हर कोने में भवन-निर्माण का कार्य करते हैं। पत्थर की कारीगरी में राजस्थान के कामगार निपुण हैं, तो काष्ठ कला, लोक-संस्कृति संवर्द्धन कला, आतिथ्य सत्कार की विशिष्टता तथा देश-विदेश में खाना बनाने की कला में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के नवयुवक अपनी मिसाल पेश करते हैं।
प्रवासी मजदूरों की स्किल मैपिंग के साथ ही देश के प्रत्येक विश्वविद्यालय तथा शिक्षण संस्थानों को यह अनिवार्य दायित्व दिया जाए कि वे अपने आसपास के गांवों में लौटे प्रवासी कामगारों के आंकड़े एकत्र करें और संस्थानों में इनके कौशल के अनुरूप सर्टिफिकेट कोर्स चलाकर इनकी गुणवत्ता को आधुनिक संचार प्रणाली से जोड़ें।
जैसे यदि कोई भवन निर्माण में निपुण है, तो उसे सिविल इंजीनियरिंग के टूल्स सिखाकर तकनीक से जोड़ा जाए। होटल प्रबंधन एवं व्यवस्था से संबंधित कौशल विकसित किए जाएं, लोक संस्कृति का संरक्षण करने हेतु आधुनिक विधाओं को विकसित करते हुए कार्य संपादन की कला सिखाई जाए। पलायन को रोकने का यही एक रास्ता है।
हर व्यक्ति यदि अपने गांव या घर में ही रोजगार प्राप्त कर लेगा, तो उसका आकर्षण अपनी जड़ों की ओर बढ़ेगा, बशर्ते जीवन-यापन की सामान्य सुविधाएं- जैसे सड़क, स्कूल, चिकित्सा आदि मौजूद हों। इससे हमारे गांव विकसित होंगे, स्वरोजगार का रास्ता मिलेगा और सरकारी नौकरियों पर निर्भरता भी कम होगी।
स्थानीय स्तर पर विकास का जो लक्ष्य केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में वोकल फॉर लोकल के रूप में दिखाई देता है, उस विजन को मिशन के रूप में यही पद्धति साकार कर सकती है। सरकार को इस संकट काल का लाभ उठाते हुए इस पुनीत कार्य को शुरू कर देना चाहिए, ताकि आपदा के इस समय हमारे देश का नवयुवक निराश होकर अवसाद की स्थिति में न पहुंच जाए।
उसके कौशल का उपयोग करने का इससे बेहतर कोई और मार्ग नहीं हो सकता। यह हम सबका सामूहिक दायित्व है कि मिलकर उसकी आंखों में रंग भरने का सह-प्रयास करें। वैसे भी भारत एक ऐसा देश है, जहां के नवयुवक उत्सवधर्मी हैं।
बड़ी से बड़ी विपदा को भी समय के साथ भूलने की महारत इन्हें हासिल है। ये कामगार अपने कौशल का युगानुरूप आकार चाहते हैं। भारत जैसे विकासशील देश की अनिवार्य कड़ी के रूप में इनका लाभ लिया जा सकता है, क्योंकि हमारे देश का नौजवान मदद नहीं, अवसर मांग रहा है।