पिछले दो दिनों में राज्यों की सीमाओं पर प्रवासी मजदूरों की भारी भीड़ ने सड़कों पर उतरकर बेशक लॉकडाउन का उल्लंघन किया, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ा है, लेकिन शहरों से गांवों के लिए निकली कतार वस्तुतः रोजगार खो चुके भयभीत और सशंकित मजदूरों की पीड़ा की ही सामूहिक अभिव्यक्ति थी।
प्रधानमंत्री द्वारा इक्कीस दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ही उन मजदूरों की आशंकाएं बढ़ गई थीं, जिन्हें अपना और परिवार का पेट पालने के लिए रोज काम पर निकलना पड़ता है। कामगारों के शहरों से निकलने का कारण बेशक वायरस का डर भी था, पर कोरोना से ज्यादा उनमें बेरोजगारी का डर था, जो सरकार के वादों और आश्वासनों से भी दूर नहीं हुआ।
दिल्ली-उत्तर प्रदेश और दिल्ली-हरियाणा की तरह आंध्र प्रदेश-कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना, आंध्र-तमिलनाडु तथा तेलंगाना-महाराष्ट्र सीमा पर भी भारी संख्या में मजदूर अपने-अपने गांव लौटने के लिए सड़कों पर उतर गए थे।
यह भीड़ इतनी ज्यादा थी कि कुछ राज्य सरकारों द्वारा बस चलाए जाने के बावजूद उनमें भारी भीड़ थी, जबकि सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता पैदल चलते हुए कुछ ने रास्ते में दम तोड़ दिया। रोजगार की तलाश में एक से दूसरे राज्यों में जाना लोगों की मजबूरी है, और 2017 के आर्थिक सर्वे का एक आंकड़ा बताता है कि 2011 से 2016 के बीच सालाना 90 लाख लोग एक राज्य से दूसरे राज्यों में गए थे।
सरकार को मजदूरों की इस परेशानी का एहसास है, इसका पता इससे चलता है कि खुद प्रधानमंत्री ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में लॉकडाउन के कारण लोगों और खासकर मजदूरों को हो परेशानी पर माफी मांगी है। अलबत्ता भारी संख्या में लोगों का गांव लौटना एक बड़े खतरे की आशंका जगाता है।
कोरोना का यह संक्रमण अगर गांवों तक पहुंचता है, तो भारी तबाही हो सकती है, क्योंकि गांवों में न तो जांच की व्यवस्था है, न इलाज की और न वेंटिलेटर की। यह आश्वस्त करने वाली बात है कि केंद्र सरकार ने अब जरूरी सख्ती दिखाते हुए राज्यों और जिलों की सीमाएं सील करने के साथ-साथ गांव लौटने वाले सभी लोगों को चौदह दिन तक अलग-थलग रखने का निर्देश दिया है।
रोजगार के अभाव में गांव लौटने वाले बेबस लोग करुणा और सहानुभूति के हकदार हैं, लेकिन कोरोना से बचाव के मोर्चे पर भी समझौता नहीं किया जा सकता।