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आधे-अधूरे उपाय, फिर भी स्वागत है

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 29 Mar 2020 01:54 AM IST
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corona virus lockdown - फोटो : अमर उजाला

शुक्रवार, 19 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री ने एलान किया कि रविवार, 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया जाएगा। मैं सोच ही रहा था कि प्रधानमंत्री आजमाना चाहते हैं और कर्फ्यू के अंत में वह लॉकडाउन जैसी कोई घोषणा कर सकते हैं। रविवार को ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई।

इस बीच, 20 मार्च और 23 मार्च के बीच कुछ राज्य सरकारों ने अपने राज्यों के अनेक हिस्सों में आंशिक या पूर्ण लॉकडाउन लागू कर दिया। सोमवार (23 मार्च) और मंगलवार (24 मार्च) को कुछ खास नहीं हुआ, सिवाय इसके कि पॉजिटिव पाए गए लोगों और मरने वालों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई।



इटली, स्पेन और ईरान में जो कुछ हुआ संभवतः उसे देखते हुए प्रधानमंत्री 24 मार्च को एक बार फिर टेलीविजन में सामने आए और उन्होंने उसी दिन मध्य रात्रि से राष्ट्रव्यापी लाकडाउन लागू किए जाने की घोषणा कर दी। यानी 25 मार्च रात 12 बजे से लॉकडाउन शुरू हो गया और जब आप इसे पढ़ रहे हैं, तो यह पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है।

ऐसे में कोई इस तथ्य की व्याख्या कैसे कर सकता है कि 19 मार्च को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित आर्थिक कार्यबल का गठन अभी तक नहीं किया गया है? बिना तैयारी की सरकार अफसोस की बात है कि 30 जनवरी को जांच में पहले मामले के पॉजिटिव आने के बाद से ढिलाई मोदी सरकार की पहचान बन गई। 

जरा गौर कीजिए
सबसे बड़ी नाकामी है अपर्याप्त जांच। महामारीविद् और मेडिकल एक्सपर्ट और अधिक जांच की वकालत कर रहे हैं। जांच, और जांच, शिनाख्त, पृथक्करण और इलाज इस समय की जरूरत है। ऐसा लगता है कि सरकार इस मामले में नाकाम हो गई है। मैं जब यह स्तंभ लिख रहा हूं, सर्वोच्च दर के अनुसार रोजाना सिर्फ 12,000 जांच ही हो सकी हैं, जिससे संक्रमित लोगों की संख्या को लेकर संदेह गहरा रहा है। 

आईसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के बार-बार रुख बदलने से भ्रम हो रहा है। आज तक इसमें स्पष्टता नहीं है; पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़कर 724 हो जाने और रोजाना नई जगहों से नए मामलों के सामने आने के बावजूद आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय का यही दावा रहा है कि भारत अब भी दूसरे चरण में है और 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' का कोई प्रमाण नहीं मिला है।
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जिस पर कई महामारीविदों ने संदेह जताया है; भारत को सात लाख पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) सूट्स, साठ लाख एन-95 मास्क और एक करोड़ थ्री-प्ले मास्क की जरूरत है। इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि बाजार में आज ये कितने उपलब्ध हैं या बाकी बचे कब तक उपलब्ध हो जाएंगे।

प्रतिबंध की मांग के बावजूद वेंटिलेटर्स, रेस्पिरेटरी डिवाइज और सैनेटाइजर के निर्यात पर 24 मार्च को ही रोक लगाई गई; आपूर्ति शृंखला बाधित है। अनेक किराना और राशन दुकानें बंद थीं, क्योंकि आपूर्ति रुकी हुई थी। कई जगह दुकान में काम करने वाले कर्मियों को दुकानों तक पहुंचने नहीं दिया गया।

दिल दहला देने वाली तस्वीरें आईं हैं, जिनमें छोटे बच्चे दिखाई दे रहे थे, जिन्होंने बताया कि घर पर भोजन नहीं होने से उन्होंने उस दिन कुछ भी नहीं खाया था और राजस्थान या उत्तर प्रदेश या बिहार अपने घरों की ओर हाईवे से पैदल चले जा रहे प्रवासी मजदूर नजर आ रहे थे। 

यह इस बात का प्रमाण है कि सरकारों ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया; पुलिस, इसमें संदेह नहीं कि राज्य सरकारों के अधीन होती है, उसे कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए। कई जगहों पर उसने डिलीवरी एजेंटों या राशन खरीदते लोगों को रोका। पुलिस द्वारा कथित उल्लंघनकर्ताओं को लाठियों से पीटने और कानून के अधिकार के बिना असामान्य दंड देने के वीडियो वायरल हो गए और भारी हंगामा हुआ।

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corona virus lockdown - फोटो : अमर उजाला
शुक्रवार, 19 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री ने एलान किया कि रविवार, 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया जाएगा। मैं सोच ही रहा था कि प्रधानमंत्री आजमाना चाहते हैं और कर्फ्यू के अंत में वह लॉकडाउन जैसी कोई घोषणा कर सकते हैं। रविवार को ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई।

इस बीच, 20 मार्च और 23 मार्च के बीच कुछ राज्य सरकारों ने अपने राज्यों के अनेक हिस्सों में आंशिक या पूर्ण लॉकडाउन लागू कर दिया। सोमवार (23 मार्च) और मंगलवार (24 मार्च) को कुछ खास नहीं हुआ, सिवाय इसके कि पॉजिटिव पाए गए लोगों और मरने वालों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई।

इटली, स्पेन और ईरान में जो कुछ हुआ संभवतः उसे देखते हुए प्रधानमंत्री 24 मार्च को एक बार फिर टेलीविजन में सामने आए और उन्होंने उसी दिन मध्य रात्रि से राष्ट्रव्यापी लाकडाउन लागू किए जाने की घोषणा कर दी। यानी 25 मार्च रात 12 बजे से लॉकडाउन शुरू हो गया और जब आप इसे पढ़ रहे हैं, तो यह पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है।

ऐसे में कोई इस तथ्य की व्याख्या कैसे कर सकता है कि 19 मार्च को प्रधानमंत्री द्वारा घोषित आर्थिक कार्यबल का गठन अभी तक नहीं किया गया है? बिना तैयारी की सरकार अफसोस की बात है कि 30 जनवरी को जांच में पहले मामले के पॉजिटिव आने के बाद से ढिलाई मोदी सरकार की पहचान बन गई। 

जरा गौर कीजिए
सबसे बड़ी नाकामी है अपर्याप्त जांच। महामारीविद् और मेडिकल एक्सपर्ट और अधिक जांच की वकालत कर रहे हैं। जांच, और जांच, शिनाख्त, पृथक्करण और इलाज इस समय की जरूरत है। ऐसा लगता है कि सरकार इस मामले में नाकाम हो गई है। मैं जब यह स्तंभ लिख रहा हूं, सर्वोच्च दर के अनुसार रोजाना सिर्फ 12,000 जांच ही हो सकी हैं, जिससे संक्रमित लोगों की संख्या को लेकर संदेह गहरा रहा है। 

आईसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के बार-बार रुख बदलने से भ्रम हो रहा है। आज तक इसमें स्पष्टता नहीं है; पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़कर 724 हो जाने और रोजाना नई जगहों से नए मामलों के सामने आने के बावजूद आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय का यही दावा रहा है कि भारत अब भी दूसरे चरण में है और 'कम्युनिटी ट्रांसमिशन' का कोई प्रमाण नहीं मिला है।

जिस पर कई महामारीविदों ने संदेह जताया है; भारत को सात लाख पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) सूट्स, साठ लाख एन-95 मास्क और एक करोड़ थ्री-प्ले मास्क की जरूरत है। इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि बाजार में आज ये कितने उपलब्ध हैं या बाकी बचे कब तक उपलब्ध हो जाएंगे।

प्रतिबंध की मांग के बावजूद वेंटिलेटर्स, रेस्पिरेटरी डिवाइज और सैनेटाइजर के निर्यात पर 24 मार्च को ही रोक लगाई गई; आपूर्ति शृंखला बाधित है। अनेक किराना और राशन दुकानें बंद थीं, क्योंकि आपूर्ति रुकी हुई थी। कई जगह दुकान में काम करने वाले कर्मियों को दुकानों तक पहुंचने नहीं दिया गया।

दिल दहला देने वाली तस्वीरें आईं हैं, जिनमें छोटे बच्चे दिखाई दे रहे थे, जिन्होंने बताया कि घर पर भोजन नहीं होने से उन्होंने उस दिन कुछ भी नहीं खाया था और राजस्थान या उत्तर प्रदेश या बिहार अपने घरों की ओर हाईवे से पैदल चले जा रहे प्रवासी मजदूर नजर आ रहे थे। 

यह इस बात का प्रमाण है कि सरकारों ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया; पुलिस, इसमें संदेह नहीं कि राज्य सरकारों के अधीन होती है, उसे कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए। कई जगहों पर उसने डिलीवरी एजेंटों या राशन खरीदते लोगों को रोका। पुलिस द्वारा कथित उल्लंघनकर्ताओं को लाठियों से पीटने और कानून के अधिकार के बिना असामान्य दंड देने के वीडियो वायरल हो गए और भारी हंगामा हुआ।

अपर्याप्त योजना

सबसे बड़ी नाकामी है, पूर्ण लॉकडाउन के साथ ही गरीबों और वंचितों, जिनमें बटाईदार, किसान, खेतिहर कामगार, दिहाड़ी मजदूर, स्वनियोजित, एमएसएमई के मालिक, काम से निकाले गए औद्योगिक मजदूर, बेसहारा और फुटपाथ पर रहने वाले शामिल हैं, के हितों को सुरक्षित रखने के उपायों की घोषणा न कर पाने की नाकामी।

अन्य बेबस लोगों में पारिश्रमिक देने के लिए जिम्मेदार नियोक्ता, कर दाता और ईएमआई से बंधे कर्जदार शामिल हैं। अनेक सुझाव दिए गए थे, मगर सरकार 26 मार्च तक दुविधा में थी। वित्त मंत्री द्वारा घोषित की गई वित्तीय कार्य योजना (एफएपी) डरपोक आधे-अधूरे उपायों से युक्त थी और निश्चित रूप से इसे व्यापक तो नहीं कहा जा सकता।

एफएपी गरीबों के अनेक तबकों को पर्याप्त खाद्य सामग्री मुहैया कराएगा, लेकिन इस योजना से उनके हाथों में पर्याप्त नकदी नहीं आएगी। बुरा यह है कि कुछ गरीब और वंचित तबकों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई हैः बटाईदार किसान, मनरेगा मजदूर, जो कि अभी मनरेगा के तहत होने वाले कामों के बिना रहेंगे, सड़कों पर रहने वाले लोग, बेसहारा, पुरुष जनधन खाताधारक, काम से निकाले गए कर्मचारी इत्यादि, जिनकी उपेक्षा की गई है।

इसके अलावा, कर भुगतान की समयसीमा के विस्तार, ईएमआई की देय तारीखों में कटौती, जीएसटी दरों में कटौती आदि जैसी जायज मांगों पर गौर नहीं किया गया। एफएपी अपर्याप्त है। मैंने सतर्कता के साथ इसका स्वागत किया है।

नेतृत्व की जरूरत

वित्त मंत्री ने हालांकि घोषणा की है कि वित्तीय कार्य योजना के लिए सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये रखे हैं, मेरा अनुमान है कि लाभार्थियों को हस्तांतरित होने वाला नकद धन करीब 60,000 करोड़ रुपये होगा और खाद्यान्न और दाल की कीमत होगी 40 हजार करोड़। यह खर्च बहुत जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। कुछ घंटों या कुछ दिनों के भीतर एफएपी के दूसरे भाग की जरूरत होगी।

अधिकांश लोग इस गलत धारणा पर यकीन करते हैं कि भारत, चीन, इटली या स्पेन की तरह प्रभावित नहीं होगा। मुझे संदेह है कि भारत कोई अपवाद नहीं है। सारे दूसरे देशों की तरह भारत को भी काफी तबाही झेलनी पड़ेगी। इसके अलावा अभी तो हम सिर्फ लोगों के जीवन, स्वास्थ और आजीविका की ही चिंता कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था, रोजगार और आय जैसे बड़े सवाल भी हैं। नीचे जाती अर्थव्यवस्था और नीचे जाएगी और तबाही तथा लोगों की तकलीफें बढ़ाएगी। सरकार को अपनी झिझक दूर करनी होगी और असाधारण रूप से साहसिक और निर्णायक नेतृत्व प्रदान करना होगा।
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