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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

शशांक दुबे
Updated Mon, 06 Apr 2020 12:32 AM IST
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सामाजिक दूरी का पालन करते लोग - फोटो : सोशल मीडिया

चैत्र की गुदगुदी हवा आज जेठ की तपन का आभास दे रही थी। सड़कों पर सुई पटक सन्नाटा पसरा था। दुकान के सामने एक-एक मीटर की दूरी पर चॉक से असंख्य गोले खिंचे हुए थे। उन गोलों को जोड़ती एक लंबी-सी सर्पीली कतार थी। कतारी इंदिराजी के आपातकाल के दिनों की तरह बिल्कुल अनुशासित, मनमोहन सिंहजी की तरह मौन, दिलीप कुमार की तरह उदास, नसीरुद्दीन शाह की तरह क्रुद्ध और शरद यादव की तरह गंभीर मुद्रा में आड़े-तिरछे खड़े हुए थे।



कतार चेतेश्वर पुजारा की पारी की तरह धीमे धीमे सरक रही थी। सब कुछ ‘ऑल इज नॉट वेल’ की तरह था। तभी उन शांत और मूक लहरों के बीच किसी ने नन्हा कंकड़ फेंका। किसी को कोई परिचित मिल गया। आदतन मुंह खुला तो 'माफो बेबा माफो' जैसे कुछ शब्द निकले। तभी बात समझ में आई। होश अब भी बाकी थे। मास्क हटाया, "आओ भैया आओ।" "हो भैया। सब छूट गया, अपना पराया" "हां भैया। जिंदगी कैसी मजे में कट रही थी। जहां जाना है, जाओ, जो खाना है, खाओ।" "अब तो...खैर छोड़ो...कब तक चलेगा ये सब? कोई रम्मूछ है?" "कायकी रम्मूछ! प्रभु की लीला, प्रभु ही जानें।"


तभी उनकी निगाह कतार की ओर आ रहे एक बाबा पर पड़ी, "क्या बाबा! आप भी मोह-माया में पड़ गए?" बाबा बोले, "अरे बच्चा, हम तो साधु ही हैं, पर चैत्र नवरात्रि चल रही है। पापी पेट को फरियाल के लिए साबूदाना, मूंगफली का दाना खरीदना होगा, उसके लिए ही इहां आए हैं। अब दो-चार लोग थोड़ी कृपा करें और हमें अपना अस्थान देकर पुण्य कमाएं। तभी आगे खड़ा व्यक्ति लघु पत्रिका से मुंह निकालकर कुड़कुड़ाया, "हम क्यों पीछे हटें, सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं, दुकानदार उधार देने को तैयार नहीं, हम क्यों पीछे हटें?" "शांत आर्य पुत्र शांत।


दिन भर घर में बैठे-बैठे व्हाट्सएप के संदेश देख कुपित होने के बदले सुबह-शाम 'रामायण' देखा करो", बाबा ने समझाया। इस बीच लाइन सरकने की मंद गति से पीड़ित रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़ा बाबू टाइप का आदमी नसीहत देने लगा, "प्लीज डिसिप्लिन मत तोड़िए। अपने-अपने गोलों पे ही खड़े रहिए"। तभी एक जेन्विन दुखियारी दो साल के बच्चे को गोद में लेकर काउंटर पर दरयाफ्त करने आई, "भैयाजी मूंग की दाल मिलेगी?" "जरूर मिलेगी बेन, लाइन में लग जाओ।" आगे हलचल देख पीछे से एक पढ़ी-लिखी लड़की नमूंदार हुई, "ओए मैडम, लाइन में लगो, हम लाइन में खड़े लोग फालतू नहीं हैं।"


"दीदी खाली पूछने के लिए ही आगे आई हूं, लाइन में तो लगूंगी ही। क्या करूं दूध मिल नहीं रहा, बच्चे को मूंग की दाल का पानी ही पिला..." तभी पता नहीं कहां से कॉलेजों में परीक्षा के वक्त आ धमकने वाली फ्लाइंग स्क्वाड की तरह पुलिस की वैन आ गई।


माइक पर ओम पुरी की तरह खरखराती आवाज़ में घोषणा हुई- सारे लोग तुरंत घर जाएं, दुकानें बंद करने का टेम हो गया है। सब तरफ अफरातफरी मच गई, लोग तितर-बितर हो गए। लेकिन पुलिस वाले भी इंसान ही थे। दो-चार लाठियां हवा में भांजने के बाद गाड़ी अगले चौराहे की ओर मोड़ दी। दस मिनट में माहौल शांत हो पाया। कतार फिर लग चुकी थी। आगे वाले पीछे, तो पीछे वाले आगे पहुंच चुके थे। बाबा सौदा लेकर नीचे उतरते हुए कतार में सबसे पीछे खड़ी उस दुखियारी को समझा रहे थे,"बिटिया, धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।" (लेखक मशहूर व्यंग्यकार हैं)

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