व्यक्ति तालाबंदी में इतना मरणासन्न महसूस कर रहा है कि फेसबुक पर लाइव हुआ जा रहा है। जो नहीं हो रहा है, वह लाइव होने के लिए तड़प रहा है। गोया, वे लाइव न हुए, तो संसार-ए-सोशल मीडिया में प्रलय आ जाएगा। बैंक-खाते में हरियाली हो, राशन का भंडार हो, पेट भरा हो, आय के लिए हाय-हाय न हो, तो आदमी सहजता से लाइव हो ही जाता है।
इधर कुछ अजीब हुआ। मेरे फेसबुक पर स्पॉन्सर्ड सूचना आई-हम मजदूर कल माननीय के फेसबुक पेज पर लाइव आ रहे हैं, ठीक दोपहर 12 बजे। जुड़िएगा जरूर।’ संदेश देख मैं सोच में पड़ गया कि खाली पेट कोई कैसे लाइव हो लेता है भला? जितनी तेजी से अफवाह फैलती है, उससे भी तेजी के साथ मैंने मित्र को फोन किया। मित्र ने दारोगाई लहजे में हड़काते हुए कहा, ‘तो इसमें नया क्या है? देश में मजदूर-मजदूरी, गरीब-गरीबी तो बड़े लोग दशकों से स्पॉन्सर कर रहे हैं।
तुमको क्या दिक्कत है उसके लाइव आने से? जो प्रतिपल मर रहा हो, वह कहीं तो लाइव आना ही चाहिए। इससे पहले कि मैं मित्र के प्रवचन काल में लॉक होकर डाउन होता, उसकी बात काटते हुए मैंने कहा, ठीक है, मैं मजदूर को फेसबुक पर लाइव जरूर देखूंगा।’
अगले दिन, ठीक 12 बजे मजदूर लाइव हुआ। चूंकि मामला स्पॉन्सर्ड था, तो प्रसारण में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ। अपनी रेलगाड़ियों का आरोह-अवरोह भी स्पॉन्सर्ड हो, तो यात्री धन्य हो जाएं। खैर। मजदूर स्क्रीन पर प्रकट हुआ।
उसके चेहरे पर उदासी और बेबसी का फेसपैक था। आंखें चांद पर बने गड्ढे के समान थीं। मजदूर का चेहरा पसीने से तर-बतर था। फेसबुक वासियों को उसका अंदाज मुग्ध कर रहा था। लाइक का राशन धड़ाधड़ स्क्रीन पर उड़ने लगा। वह मुस्करा रहा था। हाथ जोड़कर उसने नमस्कार किया।
कमेंट बॉक्स में सवाल-जवाब का सिलसिला चल पड़ा-‘नमस्ते मजदूर सा’ब! कैसे हैं आप?’ ‘जैसे भी हैं, आपके सामने हैं। हम कोई नेता या लेखक तो हैं नहीं।’ मजदूर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया। ‘और कैसे हैं आजकल?’ कमेंट बॉक्स में दूसरा प्रश्न आया। मजदूर ने फिर मुस्कराते हुए कहा, ‘जी, मजदूर का जीवन सस्ता होता है, भाग्य में उसके रस्ता होता है। तो रास्ते पर थे, हैं और मरने तक रहेंगे।
गांव की ओर जाने वाले रास्ते पर हैं। पैरों में छाले और खून निकल आए, तो सोचा लाइव दिखाकर कविता-कहानी का कुछ मैटर ही दे दें।’ उसके छाले और खून देख, कमेंट बॉक्स पर ‘सुपर,’ ‘मान गए गुरु,’ ‘लव-दिस’ जैसे स्टिकर कमेंट की मलहम-पट्टियों की बौछार होने लगी।
‘और इस बीच क्या रचा आपने?’ किसी ने रचनात्मक प्रश्न किया। मजदूर मुस्कराकर बोला, ‘सर जी, रचा बहुत कुछ। इतना रचा, इतना रचा कि अपने पास कुछ नहीं बचा। कई बंगले, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, फ्लैट, ईश्वर-घर, सड़कें आदि थोक में रच डाले। मगर अकेले नहीं रचा। इसमें हमारे जैसे अनेक रचनाकारों का योगदान रहा।
दुर्भाग्यवश वे ‘लाइव’ न आ सके। उन्हें माफ कर दीजिएगा। मंदिर-मस्जिद से ज्यादा वे अपनी भूख की चिंता कर बैठे। नादान थे न। रास्ते में ही कहीं मर गए।’ गुस्से मे लाल इमोजी के साथ कमेन्ट आया, ‘होना ही था। भला भूख धर्म से बड़ी कैसे हो सकती है?’
‘क्या आपको लगता है कि इतनी भारी मात्रा में रचनाकर्म के बाद भी आपको उचित स्थान नहीं दिया गया?’ उसने मुस्कराते हुए कहा, ‘ऐसा न कहें। रचनाओं पर हमारा कॉपीराइट नहीं रहता। एक फ्लाइओवर के नीचे स्थान लेना चाहा, तो पुलिस ने काफी टाइट कर रवाना कर दिया। ईश्वर-घरों में तो वैसे भी हमारे लिए तालाबंदी रहती है। रचनाओं के पूर्ण होते ही हम उन पर अपना अधिकार वैसे ही खो देते हैं, जैसे वोट देने के बाद आदमी अपने अधिकारों पर से अधिकार खोता है। लेकिन एक रचना है, जिस पर उचित स्थान मिला है।’
‘किस पर?’ किसी ने तुरंत पूछा। जवाब आया, ‘सड़क पर।’ और इस जवाब पर फिर से ‘लाइक,’ के रैन बसेरे बरसने लगे। वह स्क्रीन पर देखते हुए मुस्कराता रहा। शायद हम पर! या शायद अपनी भूख पर, जो कमेंट्स से शांत हो गई होगी।
‘अच्छा साहब लोग, अब हम चलते हैं। फेसबुक की समय-सीमा समाप्त। हमें भी अपनी समाप्ति से पहले गांव पहुंचना है।’ उसके इतना कहते ही स्क्रीन पर काला घना अंधेरा छा गया। अंधेरे पर पीड़ा लुप्त हो गई। कमेंटप्रिय आराम से सुप्त हो गए।