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हौसलों को मापने का कोई मीटर नहीं

सिद्धार्थ गुप्ता
Updated Fri, 17 Apr 2020 07:10 AM IST
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एंबुलेंस को सैनिटाइज करता एक कर्मचारी। - फोटो : PTI

चीन के वुहान शहर में जब कोरोना का प्रकोप बढ़ना शुरू हुआ तो जिस पहली चीज की सबसे अधिक जरूरत महसूस की गई, वह थी इंफ्रारेड थर्मामीटर। हवाई अड्डों से लेकर शॉपिंग मॉल्स तक में इंट्री और एक्जिट पॉइंट पर संदिग्ध रोगियों की पहचान में थर्मल डेटा इमेजिंग ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन बाद के दिनों में कोरोना वायरस के रहस्यों की अनेक परतें खुलनी शुरू हुईं और यह तथ्य सामने आया कि केवल थर्मल रीडिंग पर्याप्त मानक नहीं है।



समस्या यह है कि इस तरह के इंफ्रारेड मीटर भारत में नहीं बनते, इसलिए इनकी गुणवत्ता को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं। ये थर्मामीटर शरीर का सटीक तापमान नहीं बताते, लेकिन इनकी मदद से एक संकेत तो मिल ही जाता है। कोरोना से संक्रमित व्यक्ति का तापमान 99 डिग्री फारेनहाइट से लेकर 103 डिग्री फारेनहाइट तक जा सकता है।


लॉकडाउन के चलते अभी तो हेल्थकेयर सेक्टर की इकाइयों में उत्पादन या तो बंद है, या फिर क्षमता से बहुत कम है। फिलहाल तो बाजार में उपलब्ध स्टॉक से काम चलाया जा रहा है। लेकिन अनुमान है कि लॉकडाउन खुलने के बाद मांग बहुत अधिक बढ़ सकती है। हमारे पास संसाधनों की कमी जरूर है, पर हौसले बुलंद हैं।


अफसोस कि इन हौसलों को मापने का कोई थर्मामीटर नहीं। हमारे पास पर्याप्त श्रम बल भी मौजूद है। फिलहाल तो कोरोना हॉटस्पॉटस को बढ़ने से रोकना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए अधिक से अधिक संख्या में जांच करनी होगी। कोरोना संक्रमण की भयावहता को देखते हुए टेस्टिंग किट, वेंटिलेटर, पर्सनल प्रोटेक्शन किट जैसे उत्पादों की लंबे समय तक और बड़ी मात्रा में जरूरत महसूस की जा सकती है।


उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर ऐसी यूनिटों की स्थापना करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है, जहां इनका विनिर्माण होगा। सरकार को हेल्थ सेक्टर के लिए धन का आवंटन बढ़ाना चाहिए। कुछ जीवनरक्षक मेडिकल उत्पादों में हम बेहद कमजोर हैं।


'मेक इन इंडिया' के तहत उनका उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा। कोरोना वायरस के बहाने हेल्थ सेक्टर में काफी निवेश हुआ है, उसका भविष्य में बहुत फायदा मिल सकता है। अभी तो हम डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी से भी जूझ रहे हैं। देश के प्राइमरी हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए प्रयास भी हो रहे हैं।


स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होंगी, तो कोरोना का प्रकोप कम होगा और कम से कम जनहानि होगी। भारत अब घातक संक्रामक बीमारियों से लड़ने का प्रबंधन सीख रहा है। कोरोना से लोगों की मानसिकता में कई सकारात्मक बदलाव हुए हैं। साफ-सफाई के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ी है, वरना इसके बारे में इतनी गंभीरता से नहीं सोचा गया था।
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मास्क और सैनिटाइजर जैसी अच्छी आदतों का अभ्यास बढ़ा है। ये आदतें कायम रही तो वायरल और मौसमी बीमारियों के प्रकोप में कमी आ सकती है। देशव्यापी लॉकडाउन से कोविड-19 से लड़ने में बहुत मदद मिल रही है। भारत सरकार के प्रयासों की दुनिया भर में सराहना हो रही है। इटली, ब्रिटेन और अमेरिका ने सख्त कदम उठाने में थोड़ी देर कर दी और आज वे इसका खामियाजा भुगत रहे हैं।


भारत की परिस्थितियां इन देशों से कहीं अधिक भिन्न हैं। हमारी आबादी और जनघनत्व, दोनों  बहुत अधिक है। ऐसे में हम लोगों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। नागरिक के रूप में हर भारतवासी का कर्तव्य है कि अपने घरों से बाहर न निकलें। सबके साथ कुछ न कुछ परेशानियां जरूर हो रही होंगी, लेकिन ये परेशानियां देश से ऊपर तो नहीं है! हम हिंदुस्तानियों के पास हौसला इतना है कि कोई मीटर माप नहीं सकता। (लेखक हिक्स थर्मामीटर (इंडिया) प्रा.लि. के ज्वाइंट एम.डी. हैं।)

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