चाहे सही हो या गलत, पर सच्चाई यही है कि कुछ आपदाओं पर दूसरों की तुलना में अधिक ध्यान दिया जाता है। एक समान परिस्थितियों में भी हम कुछ लोगों की दुर्दशा पर ही ध्यान देते हुए दूसरों की दुर्दशा की अनदेखी क्यों कर देते हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है-आपदा के मीडिया कवरेज का स्तर और उसकी तीव्रता केवल वास्तविक पीड़ा के पैमाने पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसमें काफी हद तक निकटता, पाठकों/दर्शकों के हित, आर्थिक दांव आदि भी शामिल रहते हैं।
यह इस बात पर निर्भर है कि किसे हम अपने जीवन और हितों के लिए महत्वपूर्ण और केंद्रीय मानते हैं और किसे हाशिये का मानते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में, अत्यधिक चरम व अनिश्चित मौसम और एक ही समय में पैदा होने वाले कई संकटों के बीच क्या दुर्दशाओं को महत्वपूर्ण और कम महत्वपूर्ण की श्रेणियों में सचमुच बांटा जा सकता है? कब तक हम लोगों और स्थानों को 'दूसरे' के रूप में उपेक्षित करते रहेंगे, जबकि 'हममें' और 'उनमें' के बीच का अंतर तेजी से मिटता जा रहा है?
हाल में टिड्डियां अचानक खबरों में थीं। इन छोटे जीवों के झुंड के दिल्ली की ओर आने की भी सूचना मिली थी। हालांकि बाद में पता चला कि दिल्ली को बख्श दिया गया है, लेकिन खतरा अब भी बरकरार है। दिल्ली में टिड्डियों के खतरे से पहले कितने लोग जानते थे कि टिड्डियां हर साल राजस्थान में तबाही मचाती हैं, कि इस साल वे गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में तबाही मचा ही चुकी हैं?
इसी तरह बड़े शहरों में रहने वाले हममें से कितने लोगों के लिए सूखाग्रस्त किसान और भयंकर ग्रामीण संकट महत्वपूर्ण मुद्दे हैं? टिड्डियों की न्यूज वैल्यू इस बात पर निर्भर है कि वे कहां और किस पर हमला करती हैं। सूखा, भूकंप और अन्य आपदाओं का भी सच यही है।
अम्फान चक्रवात मेरे गृहनगर कोलकाता (जहां मैंने जन्म लिया) में दुख और भारी तबाही के निशान छोड़ गया। कोलकाता की तबाही व्यक्तिगत लगती है, क्योंकि वह मेरी स्मृतियों से जुड़ी है। लेकिन कोलकाता इकलौती जगह नहीं है, जहां चक्रवात से भारी नुकसान हुआ है। अम्फान से तबाह सुंदरबन के दृश्य और आवाजें भी पुरानी स्मृतियों को वापस लाती हैं।
पिछले वर्ष पत्रकारों के एक समूह के साथ मैंने सुंदरबन के सागर द्वीप का दौरा किया था। अपनी यात्रा के दौरान मैं कई ऐसे परिवारों से मिली थी, जिनके घर एक बार नहीं, बल्कि कई बार नष्ट हो चुके हैं। वे पूरी दुनिया के सबसे कमजोर (संवेदनशील) लोगों में से हैं। लेकिन सुपर साइक्लोन द्वारा जबर्दस्त नुकसान पहुंचाने से पहले शायद ही किसी ने उनकी कहानियां सुनी थीं। यही नहीं, वे जल्द ही समाचारों की सुर्खियों से बाहर भी हो गए।
पिछले सप्ताह मैं एक युवा सामुदायिक कार्यकर्ता से घरघराते फोन पर बात करने में कामयाब रही, जिनसे सागर द्वीप की अपनी यात्रा के दौरान मैं मिली थी। अम्फान चक्रवात में एसबेस्टस की उनकी छत उड़ जाने के कारण वह और उनका परिवार एक तंबू में थे, जहां तब तक बिजली नहीं थी।
उन्होंने बताया कि चक्रवात ने सागर द्वीप के लगभग सभी कच्चे घरों को नष्ट कर दिया है और लोग चक्रवाती शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं। मलबे की सफाई का काम शुरू हुआ है, लेकिन गिरे हुए पेड़ और जानवरों के शवों के कारण मानव स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। खारे पानी ने तालाबों को प्रदूषित कर दिया है और क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल पान की खेती बर्बाद हो गई है। बचे हुए लोगों का क्या भविष्य है? पीड़ितों के अलावा क्या किसी को वास्तव में उनकी परवाह है?
सुंदरबन को अम्फान चक्रवात के बाद अखबारों में पहले पन्ने पर जगह दी गई थी, लेकिन इसकी भंगुरता कोई नई नहीं है। बाघों और दलदली जमीन में होने वाले ऊष्णकटिबंधीय पेड़ों के लिए प्रसिद्ध यह द्वीपसमूह समुद्र के बढ़ते जल स्तर के प्रभावों को दर्शाता है।
अनेक वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, लेकिन बंगाल की खाड़ी में यह वैश्विक औसत से दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। समुद्र के बढ़ते जल स्तर के साथ द्वीप गायब हो रहे हैं और पानी और मिट्टी में लवणता बढ़ रही है। लेकिन सुंदरबन के लोगों का जीवन आमतौर पर भारत की आंतरिक नीति विमर्श से गायब रहता है।
वह युवा समुदायिक कार्यकर्ता, जिनकी छत उड़ गई थी, पीड़ा भरे स्वर में पूछते हैं कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत कम लागत वाले मकान इस तरह से क्यों बनाए जाते हैं कि वे टिकते नहीं हैं। टीन और एस्बेस्टस की छतों वाले घर क्यों बनाए जाते हैं, जब यह पता है कि वे चक्रवात के दौरान हवा और बारिश के प्रकोप में उड़ जाएंगे, जिसकी आवृत्ति बढ़ रही है। ये इस तरह के सवाल हैं, जिन्हें हाशिये पर रहने वाले पूछने के आदी हैं।
पिछले कुछ महीनों ने हमें कई संकटों का सामना करने के लिए मजबूर किया है। कोविड-19 के अलावा, ये संकट लोगों और स्थानों पर मंडरा रहे हैं, जो आम तौर पर राष्ट्रीय विमर्श के हाशिये पर हैं। हाशिये पर रहने वाले लोग केवल तभी खबर बनते हैं, जब उन पर कोई बड़ी विपत्ति आती है। लेकिन तब क्या होगा, जब आपदाएं हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाएं?
क्या हम तब भी पहले की तरह रह सकते हैं? कोविड-19 महामारी ने दिखाया है कि हम एक नए वायरस के आक्रमण को रोक नहीं सकते हैं, लेकिन तैयारी मायने रखती है। हम आपदाओं को पूरी तरह से रोकने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, लेकिन हम उनके प्रभाव को कम करने की कोशिश कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, ऊष्णकटिबंधीय वनों को व्यापक रूप से तूफानी लहरों के खिलाफ सबसे अच्छे बचाव के रूप में जाना जाता है, लेकिन ज्यादा बंदरगाहों और कारखानों का निर्माण करने के लिए भारतीय तटों से उन्हें काटा जाता है। अचानक कुछ भी नहीं होता। बदलती जलवायु, लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं-सभी संकट के संकेत हैं। हम जोखिम उठाकर ही आपदाओं की अनदेखी करते हैं।