भारत के निर्वाचन आयोग की नए ढंग से डिजाइन की गई वेबसाइट में 'इलेक्शन्स' के टैब पर एक लिंक फ्यूचर इलेक्शन्स (भावी निर्वाचन) का है। अगर आप उस पर क्लिक करें, तो यह एक छोटे टेबल के रूप में खुलता है, जिसमें यह सूचना दर्ज है कि जम्मू-कश्मीर और झारखंड की मौजूदा विधानसभा की अवधि क्रमशः आगामी 19 और नौ जनवरी को खत्म हो जाएगी। उसके नीचे एक लिंक और है, जिसमें बताया गया है कि नवंबर, 2015 में बिहार, मई-जून, 2016 में असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल, मार्च से मई 2017 के बीच गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभाओं की अवधि खत्म होंगी। फिर जुलाई, 2017 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल खत्म हो जाएगा।
विधानसभाओं की चुनावी दौड़ का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। भारत दरअसल नियमित चुनावों का देश है। महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनावी शोरगुल खत्म होते ही झारखंड में चुनाव शुरू हो जाएगा। लेकिन बाढ़ की विनाशलीला के कारण जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। ऐसे में सूबे में केंद्रीय शासन लगेगा और चुनाव अगले साल की गर्मियों में ही हो पाएगा। तब तक बिहार में विधानसभा चुनाव का समय हो जाएगा, और तमाम राजनीतिक सरगर्मियां वहां केंद्रित हो जाएंगी, जिस तरह इन दिनों हरियाणा और महाराष्ट्र में केंद्रित हैं।
देश का चुनावी परिदृश्य इस तरह विकसित हुआ है, तो इसके लिए 1960 के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम जिम्मेदार हैं। दरअसल 1967 के आम चुनाव में केंद्र की सत्ता में वापस लौटने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन फीका रहा था। कई राज्यों में तो वह सरकार ही नहीं बना पाई। नतीजतन उत्तर भारत के कई सूबे में गैरकांग्रेसी गठबंधन सरकारें बनीं। पर संयुक्त विधायक दल की ये सरकारें एकजुट न होने के कारण गिरती चली गईं और इन सभी राज्यों में नए सिरे से चुनाव कराने की स्थिति पैदा हुई। 1971 में इंदिरा गांधी ने चौथी लोकसभा को विघटित करने का फैसला लिया और पहली बार मध्यावधि चुनाव की नौबत आई। नतीजतन बाद में देश में कभी आम चुनाव नहीं हुए, जब मतदाता एक साथ लोकसभा और विधानसभा के लिए मतदान करें।
देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग-अलग होने इसलिए शुरू हुए, क्योंकि भारत एक राजनीतिक पार्टी के वर्चस्व वाली व्यवस्था से अलग हटकर उस प्रणाली में जा रहा था, जिसमें कई राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने की हैसियत में उभरने लगी थीं। पार्टी व्यवस्था के चरित्र में आ रहा यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र के अधिकाधिक भागीदार होने के तौर पर विकसित होते जाने का हिस्सा था, जो हाशिये पर पड़े हुए सामाजिक समूहों की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षा के प्रति संवेदनशील था। सरकार चलाने में इन सामाजिक समूहों के प्रतिनिधियों का अनुभव न के बराबर था। नतीजतन अंतर्विरोधों का सामंजस्य बिठाने में उन्हें बहुत वक्त लगा। अगर कोई देश में राजनीतिक गठबंधनों के कामकाज के तरीकों का अध्ययन करे, तो वह पाएगा कि समय के साथ-साथ मतदाताओं ने ज्यादा स्थिर गठबंधनों को वरीयता दी और ऐसे गठजोड़ पहले की तुलना में स्थायी भी हुए। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भारत में चूंकि हर कुछ महीने में चुनाव होते हैं, इस कारण बहुत अधिक खर्च होता है, और इसका नतीजा शासन की कमी के रूप में सामने आता है, क्योंकि चुनाव की घोषणा होते ही आचार संहिता लागू हो जाती है, जो सरकारों को नई योजनाएं शुरू करने और नीतियों में जरूरी बदलाव लाने से रोकती हैं। इसी कारण यह तर्क भी दिया जाता है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों को पहले की तरह एक साथ कर देना चाहिए। ऐसे तर्कों के पीछे एक अस्पष्ट विश्वास यह भी है कि भविष्य में लोकसभा और राज्य विधानसभाएं तय समय तक चलेंगी।
इसे सांविधानिक स्वरूप देना, लोकतांत्रिक तौर-तरीके को सीमित करना और चुने हुए विधायकों के अधिकारों को सांसदों के सुपुर्द कर देना होगा, जो परिस्थितियों के अनुरूप मनमाने फैसले लेंगे। मसलन, अगर हमारे यहां ऐसा कोई कानून होता कि एक बार समर्थन देने के बाद कोई पार्टी लोकसभा की निर्धारित अवधि तक सरकार से समर्थन वापस नहीं ले सकती, तो 2008 में भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से नाराज वाम पार्टियां यूपीए सरकार से समर्थन वापस नहीं ले पातीं। हम वाम पार्टियों के उस फैसले से असहमत हो सकते हैं, लेकिन इस तथ्य से कैसे इन्कार कर सकते हैं कि किसी मुद्दे पर सरकार से असहमत होना और समर्थन वापस लेना पार्टियों का अधिकार है?
भारत में लोकतंत्र सिर्फ एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। यहां का हर सामाजिक-राजनीतिक संगठन लोकतंत्र के सिद्धांतों पर खड़ा है। हमारे परिवार भी ज्यादातर विकासशील और कई विकसित देशों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक हैं। इसलिए चुनाव के लिए पैसे खर्च करना जरूरी खर्च है, जिसे हमें वहन करना ही चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित रहे, इसके लिए चुनावों का महत्व असंदिग्ध है। हां, जिस तरह सरकार शिक्षा उपकर लगाती है, उसी तरह राजनीतिक पार्टियां भी चुनावी खर्च के लिए चुनाव उपकर लगाने के बारे में विचार कर सकती हैं।
अलबत्ता चुनाव के समय नई योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत पर जो रोक लगी है, सरकारों को उससे मुक्त करने के बारे में सोचने की जरूरत है। चुनाव सुधार लंबे समय से लंबित पड़े हैं, और यही उपयुक्त समय है, जब चुनाव आयोग इस मसले पर सभी पार्टियों से विचार-विमर्श करे। एक तरीका यह हो सकता है कि केंद्र सरकार को आदर्श आचार संहिता से मुक्त कर सामान्य कामकाज करने दिया जाए, और सिर्फ उन राज्यों में योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा न हो, जहां विधानसभा के चुनाव होने हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी ः द मैन, द टाइम्स के लेखक