सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मांतरण और पुन: धर्मांतरण के आरक्षण पर पड़ने वाले प्रभाव पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। 15 अक्तूबर, 2026 को ‘सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट बनाम समीर अहमद एन’ के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्रीचंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों को पूर्ववर्ती जातिगत पहचान के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम प्रमाणपत्र देने की राज्य सरकार की व्यवस्था असांविधानिक घोषित की गई थी।
तमिलनाडु के परमासिवम नामक व्यक्ति ने 2015 में इस्लाम स्वीकार किया और बाद में अपना नाम समीर अहमद रख लिया। उसने मुस्लिम लब्बाई समुदाय का पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया, लेकिन संबंधित अधिकारी ने इसे अस्वीकार कर दिया। इस अस्वीकृति को चुनौती देते हुए उसने मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसी बीच, तमिलनाडु सरकार ने नौ मार्च, 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया, जिसके अंतर्गत पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदायों व अनुसूचित जातियों से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को निर्धारित परिस्थितियों में सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़े समुदायों में शामिल कर प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई। राज्य सरकार की दलील थी कि इसका उद्देश्य धर्म परिवर्तन के अधिकार की रक्षा करना और व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा देना है। हालांकि, मद्रास उच्च न्यायालय की एकल पीठ और तत्पश्चात खंडपीठ ने 2024 में इस आदेश को रद्द कर दिया था। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले पर अंतिम मुहर लगा दी।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में कई ऐसे कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया है, जो भविष्य में आरक्षण और धर्मांतरण से जुड़े विवादों का मार्गदर्शक बनेंगे। अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था त्यागकर गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था-जैसे इस्लाम या ईसाई धर्म को अपनाता है, तो उसकी पुरानी जाति से जुड़ा सामाजिक पिछड़ापन अपने आप नए धर्म में स्थानांतरित नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू सामाजिक व्यवस्था में झेला गया ऐतिहासिक या पूर्व-धर्मांतरण सामाजिक पिछड़ापन धर्मांतरित धर्म में पिछड़ा वर्ग की स्थिति प्रदान करने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।’
अदालत ने राज्य सरकारों द्वारा जारी ऐसी अधिसूचनाओं को असांविधानिक करार दिया, जो धर्म बदलने वालों के लिए बिना ठोस सामाजिक और कानूनी सर्वेक्षण के पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मार्ग खोलती हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, बिना किसी तथ्य-आधारित और आयोग द्वारा समर्थित विश्लेषण के मात्र एक प्रशासनिक आदेश द्वारा ऐसा आरक्षण देना एक ‘कृत्रिम मार्ग’ निर्मित करने जैसा है, जो संविधान की भावना के विपरीत है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16(4) राज्य को उन पिछड़े वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने की शक्ति देता है, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 16(4) का लाभ केवल उन समूहों को दिया जा सकता है, जो कानूनी रूप से निर्धारित सामाजिक व शैक्षणिक ढांचे में आते हैं। धर्म परिवर्तन व्यक्ति के पूर्व-जातीय संबंधों को खत्म कर देता है, इसलिए केवल धर्म बदलने से पूर्व-जाति का पिछड़ापन आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को इस धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। व्यक्ति को धर्म स्वीकार करने या बदलने की स्वतंत्रता प्राप्त है, लेकिन किसी विशिष्ट आरक्षण श्रेणी की सदस्यता का निर्धारण अलग कानूनी प्रश्न है। इसी प्रकार यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि धर्मांतरण के साथ व्यक्ति का प्रत्येक सामाजिक या आर्थिक पिछड़ापन समाप्त हो जाता है। वास्तविक प्रश्न यह है कि संबंधित आरक्षण व्यवस्था में उसकी पात्रता निर्धारित करने के लिए कौन-सी सांविधानिक कसौटियां लागू होती हैं।
धर्मांतरण के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने पुन: धर्मांतरण, यानी मूल धर्म या मूल जाति में वापसी, के कानूनी पहलुओं पर भी स्थिति साफ की है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म अपनाने के बाद पुनः अपने मूल धर्म में लौटता है, तो उसे आरक्षण का लाभ केवल तभी मिलेगा, जब उसकी मूल जाति या समाज उसे औपचारिक रूप से पुनः स्वीकार कर ले। केवल व्यक्ति का यह दावा करना पर्याप्त नहीं होगा कि वह पुनः अपने पुराने धर्म में आ गया है। इसके लिए सार्वजनिक घोषणा, समाज द्वारा स्वीकृति के स्पष्ट सबूत और संबंधित सक्षम अधिकारियों द्वारा गहन सत्यापन आवश्यक होगा।
यह निर्णय भारत की राजनीति, नीति-निर्माण और सामाजिक विमर्श पर गहरा असर डालेगा। इस्लाम और ईसाई धर्म जैसे एकेश्वरवादी धर्मों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं है और यह निर्णय इस वैचारिक दृष्टिकोण को सुदृढ़ करता है। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता को गति मिलेगी तथा फर्जी या प्रशासनिक फर्जीवाड़े के जरिये जारी किए जाने वाले जाति प्रमाणपत्रों पर भी अंकुश लगेगा। इसके अलावा, राज्य सरकारों की उन नीतियों पर भी रोक लगेगी, जो राजनीतिक या चुनावी लाभ के लिए बिना कानूनी आधार के आरक्षण की श्रेणियों का विस्तार करती हैं। इस निर्णय का व्यापक संदेश यह है कि सामाजिक न्याय की योजनाएं सदाशयता के साथ-साथ सांविधानिक अनुशासन पर भी आधारित होनी चाहिए। सरकारें वंचित वर्गों के उत्थान के लिए नीतियां बना सकती हैं, लेकिन किसी कार्यकारी आदेश से अधिसूचित समुदाय की सदस्यता की शर्तों को बदलना उचित नहीं है। यदि किसी सामाजिक समूह की वास्तविक पिछड़ेपन की स्थिति का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है, तो उसके लिए निर्धारित सांविधानिक और वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का 15 अक्तूबर, 2026 का यह निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में एक नया मील का पत्थर है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यक्तिगत आस्था और धर्म चुनने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन धार्मिक परिवर्तन के साथ पुराने सामाजिक ताने-बाने से मिलने वाले विशेष सांविधानिक अधिकार (जैसे आरक्षण) स्वतः लागू नहीं रहते। यह फैसला सामाजिक न्याय के वास्तविक हकदारों के अधिकारों की रक्षा करते हुए संविधान के अनुच्छेद 16(4) के मूल सिद्धांतों की निष्पक्षता बनाए रखने का कार्य करता है।