एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 मामले में शीर्ष न्यायालय ने भारत के संघवाद को ‘व्यावहारिक संघवाद’ कहा है, जिसमें संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण तो हुआ है, पर इसका झुकाव संघ की ओर है। हरियाणा बनाम पंजाब राज्य, 2004 मामले में ‘अर्ध-संघीय’ शब्द का प्रयोग किया गया था, जबकि शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1974 मामले में न्यायालय ने इसे ‘परिसंघीय से अधिक एकात्मक’ कहा था। शीर्ष न्यायालय के इन विचारों से स्पष्ट होता है कि भारत की राजनीतिक संरचना को विषम परिसंघ कहा जाना सही है, जहां विधायी शक्तियों का वितरण दो अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाली स्वायत्त सरकारों की जरूरतों के अनुसार किया गया है, हालांकि दोनों में से किसी को भी कमजोर या मजबूत नहीं बनाया गया है। इसे ही हम शक्तियों का न्यायसंगत वितरण कहते हैं।
हाल ही में, भारत के प्रधान न्यायाधीश ने मिनरल एरिया डेवलपमेंट बनाम मेसर्स स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड, 2024 मामले में कहा कि, 'भारतीय परिसंघ को विषम परिसंघ के रूप में परिभाषित किया जाता है, क्योंकि इसका झुकाव केंद्र की ओर है, जिसका उद्देश्य एक मजबूत केंद्र सरकार का गठन है। पर राज्यों को उनके अधिकार क्षेत्र के भीतर कानून बनाने की संप्रभु शक्तियां दी गई हैं। परिसंघीय ढांचे में प्रत्येक इकाई को एक निश्चित सीमा तक स्वतंत्रता के साथ अपने मूल सांविधानिक कार्यों को करने में सक्षम होना चाहिए। संविधान की व्याख्या इस तरह होनी चाहिए कि परिसंघीय चरित्र कमजोर न हो। न्यायालय को सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य विधानसभाएं अपने आरक्षित क्षेत्रों में संघ के अधीन न हों।'
संविधान के अनुच्छेद एक के तहत, भारत को राज्यों के एक संघ के रूप में स्थापित किया गया है, जहां राज्यों के निर्माण का अधिकार संघ का है और राज्य भारत के आवश्यक भाग हैं। अनुच्छेद 245 कानून बनाने के लिए भारत के राज्यक्षेत्र का वर्गीकरण करता है और संघ व राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों की प्रयोज्यता की सीमा का प्रावधान करता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 246 संघ और राज्यों के बीच कानून बनाने के लिए विषयों का बंटवारा करता है, फिर भी संसद को 'अवशिष्ट शक्तियों' के तहत उन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है और जो नए उभरने वाले विषय हैं। यही परिसंघीय ढांचे को विषम परिसंघ बनाता है।
इसी प्रकार, वित्तीय शक्तियां भी संघ में निहित हैं, जिसके लिए अनुच्छेद 109 का खंड (1) उल्लेखनीय है, जो यह प्रावधान करता है कि धन विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जाएगा। विषम परिसंघ के ये प्रावधान भारत को एक कार्यात्मक परिसंघ भी बनाते हैं, जिसमें वित्तीय और नए उभरने वाले विषयों की शक्तियां राज्यों में निहित नहीं होती हैं।
सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों में विभिन्न विषयों को शामिल किया गया है, हालांकि, संघ सूची के कुछ विषयों को राज्य के विषयों पर वरीयता दी गई है, फिर भी यह परिसंघ को कमजोर नहीं बनाता है। जैसे, राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में ‘पानी' यानी जल आपूर्ति, सिंचाई और नहरें, जल निकासी और तटबंध, जल भंडारण और जल शक्ति सूची I की प्रविष्टि 56 के प्रावधानों के अधीन हैं।
2024 के मिनरल एरिया डेवलपमेंट मामले में दिए गए फैसले में उच्चतम न्यायालय ने विशेष रूप से कर लगाने संबंधी राज्यों की विधायी क्षमता की जांच की। मुख्य प्रश्न यह जांचना था कि क्या खनन पट्टों पर रॉयल्टी को कर माना जाना चाहिए और क्या संसदीय कानून, खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के बाद राज्यों को खनिज अधिकारों पर रॉयल्टी/कर लगाने का अधिकार है। न्यायालय ने माना कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्य विधानसभाओं में निहित है। संसद के पास सूची-1 की प्रविष्टि 54 के तहत खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता नहीं है, यह एक सामान्य प्रविष्टि है। चूंकि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति सूची-2 की प्रविष्टि 50 में उल्लिखित है, इसलिए संसद उस विषय वस्तु के संबंध में अपनी अवशिष्ट शक्ति का उपयोग नहीं कर सकती है। राज्यों की विधायी क्षमता पर केवल इसलिए सवाल नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि भारतीय परिसंघ विषम है।
संविधान निर्माताओं ने संघ और राज्यों के बीच किसी भी संभावित टकराव को रोकने के लिए सातवीं अनुसूची में विषयों को बहुत स्पष्टता से सूचीबद्ध किया है। इसके अलावा, समन्वय का सिद्धांत समवर्ती सूची में अच्छी तरह से स्थापित है, जिसमें संघ और राज्य, दोनों कानून बना सकते हैं। भारत के संविधान ने संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन के संदर्भ में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को अपनाया है, जो दोनों में से किसी को भी संप्रभु होने से रोकता है। इस अर्थ में, संघ और राज्यों, दोनों की विधायी क्षमता इतनी संतुलित है कि परिसंघीय विषमता कानून बनाने के कार्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित नहीं करती है, ताकि संसाधनों को न्यायसंगत ढंग से वितरित करके व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने का साझा लक्ष्य प्राप्त किया जा सके, और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए लोकतांत्रिक शासन को सर्व-समावेशी और सर्वव्यापी बनाया जा सके।