पता नहीं, कांग्रेसी इन दिनों क्या गिन रहे हैं- कोलगेट मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जितने विशेषण उन्हें दिए हैं, उसे गिन रहे हैं कि कर्नाटक में मिली 121 सीटें गिन रहे हैं?
अगर वे पहली गिनती में लगे हैं, तो भविष्य के लिए आशा की जा सकती है; अगर वे दूसरी गिनती में लगे हैं, तो भविष्य अंधेरा है।
मुझे याद नहीं कि कभी जीत और हार इस तरह एक साथ आई हो और कांग्रेसियों के लिए यह समझने की नौबत आ गई हो कि कब जीत और हार में अंतर होता है और कब फर्क सिर्फ शब्दों का होता है!
चौदह वर्षों के बाद कर्नाटक में कांग्रेस अपने बूते सरकार बनाने की हालत में पहुंची है। लेकिन वहां कांग्रेस की जीत हुई है या भारतीय जनता पार्टी की हार, इसका फैसला कैसे हो? कांग्रेस ने ऐसा कुछ किया नहीं कि उसे वोट देने मतदाता उमड़ पड़ते।
उसने अगर कुछ किया है, तो केंद्र में घोटालों का जंजाल खड़ा किया है, जिसके आधार पर वोट तो नहीं मिल सकते हैं। पहले पश्चिम बंगाल में, फिर उत्तर प्रदेश में और फिर गुजरात में भी उसे वोट नहीं मिले।
असल में कांग्रेस दिल्ली की अपनी कुर्सी बचाए रखने में इतनी तल्लीन रही है कि देश में उसे खुद को खोजने की फुर्सत ही नहीं है।
कर्नाटक में असली काम किया भाजपा ने। राजनीतिक दल के तौर पर वह कितनी अयोग्य हो सकती है, यह देखना हो, तो कर्नाटक जाने की जरूरत है। दक्षिण भारत में कर्नाटक ही पहला राज्य था, जिसने भाजपा को मौका दिया था, मगर वह उसे संभाल नहीं सकी।
येदियुरप्पा सत्ता के लोभी अवसरवादी हैं, यह सभी जानते थे, पर उनकी लगाम खींचने की हिम्मत पार्टी में किसी में नहीं थी। यह लगभग वैसा ही मामला है, जैसा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी सहित सभी जानते थे कि वह जो कर रहे हैं, वह नैतिक भी नहीं है और राजनीतिक भी नहीं।
लेकिन सत्ता की गोटियां बिठाना ही राजनीति है, ऐसा मानने वालों ने उन्हें लगाम लगाने नहीं दिया और भाजपा माने कि न माने नरेंद्र मोदी विक्रमादित्य के कंधे के बोझ की तरह हैं, जिसे वह उतार नहीं पा रही है।
राजनीति का पहला पाठ यही है कि किसी को उसके कद से बड़ी कुर्सी पर बिठाओ मत और पांव से बड़ा जूता मत पहनने दो। कर्नाटक में भाजपा ने ये दोनों गलतियां कीं।
कर्नाटक में येदियुरप्पा ही नहीं थे, बेल्लारी के रेड्डी बंधु भी थे। ऐसा तो हर दल में होता है, पर कर्नाटक में भाजपा ने रेड्डी बंधुओं के हाथ में राजनीतिक बागडोर भी सौंप दी थी।
नतीजतन राजनीतिक मनमानी व घमंड, आर्थिक भ्रष्टाचार और दिल्ली की रस्साकशी सबका कर्नाटक में खुला खेल हुआ।
कर्नाटक की जनता के पास विकल्प था ही नहीं। वह भाजपा को देखना भी नहीं चाहती थी और देवगौड़ा परिवार की राजनीति उसे कभी भाई नहीं। और कांग्रेस का दिल्ली-प्रदर्शन भला किसे पसंद आ सकता था।
कर्नाटक का चुनाव इसी दुविधा का प्रकटीकरण है। कांग्रेस इसे अपनी जीत भले मान ले, लेकिन यह न भूले कि उसे इस बार पिछली बार से सिर्फ 1.8 फीसदी यानी 36.6 फीसदी वोट ही मिले हैं।
वोटों में हुई इस अत्यंत मामूली वृद्धि से 42 सीटों का बड़ा फर्क तो पड़ गया, लेकिन यहीं पर खतरे की घंटी भी है। उसे यह याद रखना चाहिए कि देवगौड़ा परिवार की पार्टी को मिले वोटों में भी एक फीसदी का इजाफा हुआ है।
करीब 60 सीटें ऐसी हैं, जहां हार-जीत का अंतर पांच हजार मतों से भी कम है। यह बताता है कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत असमंजस में पड़े मतदाता की उलझन का नतीजा है।
कर्नाटक में कांग्रेस जीती है या भाजपा की हार हुई है, इसको जांचने का एक मौका अभी सामने ही है। हम देखेंगे कि 10-जनपथ मुख्यमंत्री चुनने में क्या रवैया अपनाता है और उस चुने व्यक्ति को सरकार बनाने में कितनी आजादी मिलती है।
कांग्रेस की इस जीत में सिद्धरमैया की भूमिका सबसे अहम रही है। वह बेदाग हैं, उनके प्रशासन की धाक है और सबसे अधिक विधायक उनके साथ हैं।
यहां-वहां बैठे या 10-जनपथ की संकरी गली से निकल कर आए लोगों में से किसी को अगर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया गया, तो कांग्रेस यह जीती बाजी हार जाएगी। जवाब जनपथ से आना है।