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कांग्रेस किस ओर जा रही है

Tue, 10 Jun 2014 08:12 PM IST
नीरजा चौधरी
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लोकसभा में कांग्रेस के नेता के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे की नियुक्ति का फैसला चौंकाने वाला था, पर अब इससे हैरत नहीं होती। असल में चुनाव के दौरान मजाक में कहा जा रहा था कि यदि कांग्रेस पराजित होती है, तो राहुल गांधी पांच वर्ष तक विपक्ष के नेता के रूप में अनुभव बटोरेंगे और 2019 के लिए खुद को तैयार करेंगे। चुनाव में कांग्रेस के पराजित होने के बाद राहुल लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करने को राजी नहीं हुए। वह पहले की तरह ही सदन में पिछली सीट पर बैठ रहे हैं और पार्टी में उपाध्यक्ष की भूमिका निभा रहे हैं।
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खड़गे की नियुक्ति का फैसला आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि राहुल राजनीति को लेकर अनमने नजर आते हैं। अगर पिछले दस वर्षों के दौरान संसद में बोलते, तो वह विभिन्न मुद्दों को ठीक से समझ पाते और शायद अर्णब गोस्वामी जैसों का सामना करने में उन्हें परेशानी नहीं होती। चुनाव प्रचार के दौरान कई लोगों ने महसूस भी किया होगा कि राहुल गांधी की मंशा सही थी, लेकिन चूंकि उनकी राजनीतिक भागीदारी अनियमित रही है, इसलिए उन्हें यह भरोसा नहीं था कि वह देश का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त रूप से 'परिपक्व' हो चुके हैं।

लिहाजा जबर्दस्ती किसी परिस्थिति में बांधने के बजाय कांग्रेस को राहुल की उस भूमिका का सम्मान करना चाहिए, जो वह चाहते हैं। लेकिन फिलवक्त देश की इस सबसे पुरानी पार्टी का भाग्य इससे जोड़ दिया गया है कि राहुल क्या करेंगे और क्या नहीं। यह न तो कांग्रेस की सेहत के लिए ठीक है और न ही राहुल के लिए। हालांकि कई कांग्रेसी यह पूछ रहे हैं, और जो मौजूं सवाल भी है कि क्या राहुल सामने आने के बजाय पर्दे के पीछे से पार्टी पर नियंत्रण रखेंगे?
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बहरहाल, राहुल गांधी लोकसभा में 'नेतृत्व' की भूमिका में नहीं आना चाहते, सो कांग्रेस आलाकमान ने कमलनाथ को दरकिनार कर मल्लिकार्जुन खड़गे पर भरोसा जताया, जिसकी वजह खड़गे की प्रशासनिक समझ है। इसके अतिरिक्त उनकी नियुक्ति का एक कारण यह भी था कि वह दक्षिण से आते हैं और केरल तथा कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों ने ही सबसे ज्यादा कांग्रेसी सांसद लोकसभा में भेजे हैं। इतना ही नहीं, खड़गे दलित नेता भी हैं। इसके बरक्स राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद को सदन का नेता नियुक्त करके कांग्रेस ने अपनी पुरानी दलित-मुस्लिम परंपरा का ही निर्वहन किया है। हालांकि उसे समझना चाहिए कि अब ऐसी सांकेतिक राजनीति का वक्त बीत चुका है और 2014 के चुनाव परिणाम का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है।

चुनाव परिणाम के बाद इन शुरुआती कदमों से यही लग रहा है कि कांग्रेस के पास ज्यादा पत्ते नहीं हैं, सिवाय इसके कि वह यहां-वहां नियुक्ति कर सांगठनिक रद्दोबदल करे। यह एक कटु सच्चाई है कि कांग्रेस को अपनी 'कार्य संस्कृति' बदलनी होगी। सब कुछ ध्यान में रखते हुए उसे कठिन परिश्रम के लिए तैयार होना होगा और दिल्ली या राज्यों की राजधानी में कमरों में बैठकर अपनी राजनीति संचालित करने के बजाय उसे आम लोगों के बीच जाना होगा। जब कोई संगठन कमजोर होता है, चुनाव हारने के बाद किसी भी राजनीतिक दल के साथ ऐसा हो सकता है, तो विरोधी या आलोचक उंगली नेतृत्व पर ही उठाते हैं। अनुभवहीन आम आदमी पार्टी में हो रही उठापटक से यह आसानी से समझा जा सकता है। लिहाजा पहली बार राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर भी सवाल उठे हैं। हालांकि उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दी गई है, पर वे कमजोर जरूर हुए हैं।

बेशक अभी किसी भी कार्ययोजना को मूर्त रूप देने के शुरुआती दिन हैं, लेकिन जिस तेजी से नरेंद्र मोदी आगे बढ़ रहे हैं, उससे पार्टी की मुश्किलें बढ़ती ही जाएंगी। कांग्रेस को यह भी पता है कि अभी वह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ बहुत कुछ नहीं बोल सकती, क्योंकि अभी तो उसने शुरुआत ही की है। हैरत नहीं होनी चाहिए कि मोदी की प्रशंसा करने वाले शशि थरूर की जब मणिशंकर अय्यर ने आलोचना की, तो लोगों में उसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुई।

केरल के सांसद केवी थॉमस ने प्रियंका वाड्रा से पार्टी को बचाने की गुहार की है। निस्संदेह उन्होंने अपनी मां और भाई के लिए ही प्रचार किया, लेकिन नरेंद्र मोदी के साथ उनका द्वंद्व कई आयामों को समेटे था। लिहाजा कइयों का मानना है कि प्रियंका ही एकमात्र कार्ड है, जिसके भरोसे कांग्रेस आगे बढ़ सकती है। कांग्रेसी चाहते हैं कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में आए, लेकिन क्या वह बड़ी भूमिका निभाने को इच्छुक हैं? उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर जो आरोप हैं, प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने के बाद उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? और इसका पहली बार वोट डालने वाले उन 12 करोड़ युवा मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा, जो वंशवादी राजनीति के खिलाफ हैं और जो मोदी से प्रभावित हैं? दरअसल इसी जनभावना को समझते हुए ही तो मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में भाजपा नेताओं के बच्चों को जगह नहीं दी। फिर चाहे वह जयंत सिंह हों, दुष्यंत सिंह हों या फिर पूनम महाजन, अनुराग ठाकुर या वरुण गांधी।

बहरहाल, पिछले दिनों दिग्विजय सिंह ने एक रोचक सलाह दी। उन्होंने उन सभी नेताओं को वापस पार्टी में आने का अनुरोध किया, जिन्होंने पूर्व में पार्टी छोड़ दी थी। इनमें ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और जगन रेड्डी और वाईएसआर कांग्रेस शामिल हैं। हालांकि इसकी संभावना इसलिए नहीं है, क्योंकि ममता बनर्जी 2016 में दोबारा जीत की संभावना देख रही हैं, तो शरद पवार अक्तूबर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की राह देख रहे हैं। इसके बावजूद इस बात की कितनी संभावनाएं हैं कि आज नहीं तो कल, गांधी परिवार के किसी सदस्य के बिना कांग्रेस के सभी पूर्व सहयोगी एक झंडे के तले एकजुट होंगे? सोनिया, राहुल और प्रियंका जब तक मिलकर काम कर रहे हैं, इसके आसार नजर नहीं आते।
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