आप कभी आधी रात के करीब कोलकाता के सेंट्रल एवेन्यू पर ड्राइव करें। क्या आपने कभी उस ओर ध्यान दिया है कि जो लोग सड़क के किनारे सो रहे हैं, उनके पास रात में रहने की जगह क्यों नहीं है? क्या आपने कभी किसी से यह जानने की कोशिश की है? इसी तरह दिल्ली में किसी भी चौराहे से गुजरें। बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे मिलेंगे, जो भीख मांगते हैं या फूल, तौलिये या पायरेटेड किताबें बेचते हें। यह दृश्य क्या आपके जेहन में यह सवाल पैदा नहीं करता कि ये बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते हैं? आप भारत के ऐसे सूखे इलाकों से गुजरें, जहां पानी का कोई नामोनिशान नहीं है। वहां जमीन पर कुछ भी नहीं उगता है, फिर भी वहां हजारों की संख्या में लोग रहते हैं। हमें यह जानने में शायद ही दिलचस्पी हो कि उन लोगों की आजीविका का स्रोत क्या है? कांग्रेस का 2024 का घोषणा-पत्र इस बात की पुष्टि करता है कि पिछले कई वर्षों में, खासकर पिछले तीन दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई है। हालांकि चमकते भारत की यह तस्वीर उस सच को छिपा नहीं सकती है, जो हमारी विफलताओं को याद दिलाकर हमें अपनी नीति को सही करने का संदेश देता है।
अर्थव्यवस्था समाज का दर्पण है
यूएनडीपी के अनुसार, भारत के शहरी क्षेत्र में हर महीने 1286 और ग्रामीण क्षेत्र में 1089 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है। एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में गरीब लोगों की संख्या करीब 22.8 करोड़ है। हालांकि यह आकलन बहुत कम है। वर्ल्ड इक्वलिटी लैब के अनुसार, निचले 50 प्रतिशत लोगों (71 करोड़) के पास राष्ट्रीय संपत्ति का 3 प्रतिशत हिस्सा है और वे राष्ट्रीय आय का 13 प्रतिशत कमाते हैं। सरकार के सकल घरेलू खर्च सर्वेक्षण (एचसीएसई) के अनुसार, निचले 50 फीसदी लोगों में शहरी क्षेत्र के लोगों ने 3094 रुपये प्रतिमाह और ग्रामीण लोगों ने 2001 रुपये प्रतिमाह खर्च किए। इसके बाद निचले 20 प्रतिशत लोगों के घरेलू खर्च का अनुमान लगाने के लिए ज्यादा गणितीय कौशल की जरूरत नहीं है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के 125 देशों की सूची में भारत 111वें नंबर पर है।
एचसीएसई के अनुसार, ओबीसी औसत स्तर पर हैं, जबकि एससी और एसटी सबसे ज्यादा गरीब हैं। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि आर्थिक स्थिति समाज में लोगों की हैसियत तय करती है। गरीब और उत्पीड़ित लोग बेहद कम मजदूरी पर कड़ी मेहनत करते हैं। करीब 15.4 करोड़ लोग मनरेगा के तहत पंजीकृत हैं और वे सक्रिय हैं। उन्हें सालभर में मात्र 50 दिनों का काम मिलता है। दूसरी तरफ ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी राष्ट्रीय आय का 57.7 फीसदी कमाती है, जिसमें 9223 लोगों की साझेदारी का प्रतिशत 2.1 है और 92,234 लोगों की साझेदारी 4.3 प्रतिशत है। भारत में अमीरी और गरीबी का आकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि जिन लेंबोर्गिनी कारों की कीमत प्रति कार 3.22 करोड़ रुपये से 8.89 करोड़ रुपये के बीच है, 2023 में ऐसी 103 कारें बेची गईं। इस बात को लेकर अमीर लोगों ने उस समय गर्व महसूस किया, जब महज 362 लोगों ने 757 करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉल बॉन्ड खरीदे और उस राशि को राजनीतिक दलों को दान में दे दिया।
क्या अच्छे दिन आए? क्या भारत या भारतीय आत्मनिर्भर हो पाए? चीन, जिसके सैनिकों ने भारतीय जमीन पर कब्जा किया और जवानों की पिटाई की, उसके साथ 2023-24 में व्यापार घाटा 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था। क्या यही अमृत काल की शुरुआत है? आखिर लोगों को कब तक धोखे में रखकर झूठ बोला जाएगा।
दो कारक
जब तक राजनीतिक दल यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय अर्थव्यवस्था जाति और असमानता पर आधारित है, तब तक हम गरीबी, भेदभाव और उत्पीड़न को खत्म नहीं कर सकते। कांग्रेस के घोषणा-पत्र ने भाजपा के ‘विकास’ वाले नैरेटिव के स्याह पक्ष की ओर लोगों का ध्यान खींचा और जनता से कुछ सरल वादे किए-
एससी, एसटी और ओबीसी के लिए
- देशभर में सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना आयोजित करना और डेटा एकत्र करना, जो सकारात्मक कार्रवाई के एजेंडे को मजबूत करेगा।
- एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को हटाना।
- एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की सभी बैकलॉग रिक्तियों को एक साल के भीतर भरना।
युवाओं के लिए
- एक साल की अप्रेंटिसशिप और प्रति वर्ष 1,00,000 रुपये के स्टाइपेंड की गारंटी और नौकरियां प्रदान करना।
- केंद्र सरकार में लगभग 30 लाख रिक्तियों को भरना।
- बकाया शिक्षा ऋण और अवैतनिक ब्याज माफ करना।
महिलाओं के लिए
- महालक्ष्मी योजना शुरू करना और सबसे गरीब परिवारों को प्रति वर्ष 1,00,000 रुपये प्रदान करना।
- मनरेगा कार्य के लिए न्यूनतम मजदूरी 400 रुपये प्रतिदिन तक करना।
- केंद्र सरकार की नौकरियों में 50 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित करना।
गरीबों की ओर भी ध्यान
जब जून 2024 में नई सरकार का गठन होगा, तब उस सरकार की प्राथमिकता में ‘गरीब और बहिष्कृत’ होना चाहिए। कांग्रेस के घोषणा-पत्र में इस दायित्व को स्वीकार किया गया, इसलिए यह पूरे देश में ‘चर्चा का विषय’ बन गया। भाजपा ने अपनी अधिकांश ऊर्जा और धन शक्ति कांग्रेस के घोषणा-पत्र की निंदा करने में खर्च कर दी।
जैसे-जैसे चुनाव सातवें चरणों की ओर बढ़ रहे हैं, लड़ाई यथास्थिति को बहाल रखने के लिए संकल्पित लोगों और उस स्थिति को रोकने वालों के बीच होती जा रही है। ऐसे में 4 जून तक सावधान रहने की जरूरत है।