जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई पर संसद में दूसरी बार बयान देते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि उनकी गतिविधियों पर खुफिया नजर रखी जा रही है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा था कि मसर्रत की रिहाई केंद्र सरकार को जानकारी दिए बगैर हुई। अलगाववादी की रिहाई पर केंद्र सरकार की चिंता स्वाभाविक है। पर कानून-व्यवस्था जब राज्य का विषय है, तो मुफ्ती सरकार को कितनी स्वतंत्रता प्राप्त होगी? व्यवस्था के संचालन में राज्य असावधानी करे, तो वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। वैसे में केंद्र विधानसभाओं को निलंबित या बर्खास्त कर सकता है। यह मुद्दा तब भी उठा था, जब 1955 में शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया। उसके बाद जम्मू-कश्मीर भी अनुच्छेद 370 के बावजूद केंद्र के अधीन एक राज्य बन गया, जहां सरकारें बर्खास्त हो सकती हैं। पर संविधान में राज्यों का वर्गीकरण और अधिकारों का जो विभाजन हुआ है, उसमें कानून-व्यवस्था राज्य के ही विषय हैं। इसीलिए जब अपराधों पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय एजेंसी बनाने का मामला सामने आया था, तब कई राज्यों ने इसका विरोध किया था। अब भी अपराधों की जांच-पड़ताल के लिए सीबीआई न तो स्वयं कोई मामला अपने हाथ में ले सकती है, न केंद्र के आदेश से दखलंदाजी कर सकती है। मसर्रत आलम की रिहाई राज्य सरकार द्वारा की गई। पर जिन मामलों में स्पष्ट विधिक व्यवस्था है, राज्य सरकारें भी उसके विपरीत आचरण नहीं कर सकतीं। इसलिए राज्य सरकार को, जो सभी विचाराधीन मामलों में अभियोक्ता और प्रथम पक्ष है, यह भी अधिकार है कि न्यायालय में विचाराधीन किसी प्रकरण को वापस ले ले, पर यह न्यायालय की सहमति के बिना नहीं हो सकता।
सवाल यह है कि राज्यों को कितनी स्वायत्तता होगी। अगर राज्य केंद्र की इच्छा का पालन करेंगे, तो यह संस्था, जिसका प्रमुख गुण स्वतंत्रता है, अपना महत्व कैसे बचा पाएगी? भारत जैसे बहुदलीय संसदीय प्रणाली वाले देश में विभिन्न विषयों पर वैचारिक एकता संभव नहीं। राज्यों को विधायी अधिकार भी हैं, जिससे वे अलग से भी कानून का सृजन करते हैं, जो राज्य तक सीमित होते हैं, पर वे असांविधानिक नहीं। इसलिए जिन व्यक्तियों के खिलाफ मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं, उनका अभियोक्ता तो राज्य ही होगा।
इसलिए राज्य नामक संस्था और उसके सांविधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए, यह प्रमुख प्रश्न है। केंद्र यदि किसी राज्य की व्यवस्था और उसके निर्णयों से संतुष्ट नहीं है, तो उसके पास कितने विकल्प हैं? वह राज्य से किसी प्रश्न पर रिपोर्ट मांग सकता है और उस पर अपनी राय भी बना सकता है, पर कार्रवाई के लिए तो वह तभी सक्षम होगा, जब वह राज्य का कामकाज संविधान सम्मत की परिभाषा में न आता हो। वह किसी राज्य सरकार को इस आधार पर बर्खास्त कर सकता है कि उसकी व्यवस्था सांविधानिक ढंग से संचालित नहीं हो रही। पर सांविधानिक जटिलताओं को देखते हुए केंद्र की इच्छा पूरी तरह लागू हो पाना भी संभव नहीं। फिर केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा जम्मू-कश्मीर सरकार में सहयोगी है, ऐसे में, वहां किस निर्णय को सरकार का निर्णय माना जाए? फिर जब तक वहां मंत्रिपरिषद कायम है, तब तक किसी फैसले के लिए अकेले मुख्यमंत्री को तो जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता। साफ है कि मसर्रत आलम की रिहाई को सिर्फ एक अलगाववादी की रिहाई के रूप में नहीं देखा जा सकता।