केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से अपने उस आदेश पर फिर से सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आग्रह किया है, जिसके अनुसार, भीषण गड़बड़ी वाले क्षेत्रों में सशस्त्र विद्रोह से निपटने के लिए सैन्य बलों द्वारा की गई कार्रवाई में किसी की मौत होने पर एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज करना अनिर्वाय बना दिया गया है। पहले सशस्त्र सेना के सदस्यों को इस तरह की कार्रवाई से सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून के तहत छूट मिली हुई थी।
इसमें शक नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐसी घटनाओं को संज्ञान में लेने के बाद ही ऐसा आदेश दिया होगा। पर सरकार की तरफ से भी यह स्पष्ट करने में उसके वकीलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी कि जिन परिस्थितियों में सैनिक और अर्द्धसैनिक बल के लोग देश में गणतांत्रिक संविधान में आस्था न रखने वाले विद्रोहियों, गद्दारों और उपद्रवियों का सामना करते हैं, उनमें शांति और सुव्यवस्था वाले क्षेत्रों की आम जनता के जैसा सलूक करने से सैन्य बल कोई सफलता हासिल नहीं कर पाएगी।
समय आ गया है कि आरामकुर्सी में बैठकर सशस्त्र विद्रोहियों से शांति वार्ता कर उनमें हृदय परिवर्तन की संभावनाएं तलाशने वाले लोग सैन्य और अर्द्धसैन्य बल की मजबूरियों और सीमाओं का भी जायजा लें, जिनके हाथ पीठ के पीछे बांधकर कंधों पर देश की अखंडता की रक्षा करने का दायित्व लाद दिया गया है। श्रीनगर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में देश-विरोधी तत्वों ने संविधान द्वारा दिए हर भारतीय नागरिक के मतदान के अधिकार का जिस तरह जनाजा निकाला, उसे टीवी चैनलों पर देखकर किसी भी नागरिक का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। इतना संतोष तो है ही कि तमाम व्यवधानों के बावजूद चुनाव संपन्न कराए गए। तमाम टीवी चैनलों पर वे अपमानजनक दृश्य भी दिखाए गए, जिनमें श्रीनगर के मुख्य मार्ग पर केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लिप्त, एके-47 से सुसज्जित जवानों ने कश्मीरी गुंडों द्वारा अपमानित किए जाने को चुपचाप सहा।
मणिपुर से अफ्स्पा हटा देने की मांग करते हुए वर्षों तक उपवास रखने वाली इरोम शर्मिला ने जनतांत्रिक प्रणाली का हिस्सा बनने के लिए चुनाव लड़ने का निश्चय किया। पर चुनाव में उनकी हास्यास्पद हार ने साफ कर दिया कि आम मणिपुरी उनके त्याग के लिए भले सहानुभूति रखे, पर वह जानता है कि विशिष्ट परिस्थितियों में सैन्य बलों को विशेष अधिकार देने ही पड़ते हैं।
कश्मीर की स्थिति देखते हुए सेना को नागरिक क्षेत्र में दंगाइयों और पत्थरमारों के सीधे संपर्क में न आने देने का निर्णय सही है। अर्द्धसैनिक बल इन परिस्थितियों में कुछ अलग, पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, अतः जम्मू-कश्मीर में उनकी उपस्थिति अपरिहार्य है। पर अफसोस इसका है कि जो शांतिवादी सेना को फासले पर रखकर अर्द्धसैनिक बलों को ही नागरिक संपर्क में रखने के पक्षधर हैं, उन्होंने सीआरपीएफ के उस जवान की दुर्गति पर आक्रोश व्यक्त नहीं किया, जो सरे बाजार गुंडों की गालियां झेलता रहा। कश्मीर की स्थिति को सद्भाव से सुलझाने के पक्षधरों तक उस बेबस, आहत सैनिक और उसके समाज की प्रतिक्रिया पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है, जितना विशेषाधिकार का हनन करने वाले सशस्त्र सैनिकों की प्रतिक्रिया को काबू में रखने की उनकी मांग मान लेना।