लिखा तो था ‘खुदा’ मगर नुक्ते के फेर से बन गया ‘जुदा'। आशीष नंदी का 'विवादास्पद बयान' वाला मुद्दा कुल मिलाकर उर्दू की इसी कहावत जैसी बात थी, जिसका बतंगड़ बन गया है। जिंदगी भर समाज के हाशियग्रस्त समूहों की हिमायत करने वाले नंदी दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय के पक्ष में एक बारीक तर्क गढ़ रहे थे।
बात रखते-रखते एक वाक्य में जुबान फिसल गई। और बस, मीडिया उस वाक्यांश पर पिल पड़ा और हाशियाग्रस्त समुदायों के सिद्धांतकार आशीष नंदी पर यह तोहमत लग गई कि वह दलित, आदिवासी विरोधी हैं। और अब उन पर अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी चल रही है। एक प्रहसन अब त्रासदी में बदल रहा है।
आशीष नंदी के शब्द अक्सर गुगली गेंद जैसे घुमावदार होते हैं। वह उक्ति-वैचित्र्य के प्रेमी हैं, अपनी बात अक्सर अन्योक्ति और वक्रोक्ति में कहते हैं और अपने बुझौवलों से पाठक को चौंका देते हैं। बहुधा वह अपने तर्क को दृष्टांत में बदलकर पेश करते हैं या फिर उसकी जगह कोई झनझनाता हुआ आंकड़ा या फिर कोई चुटकुला ही छेड़ देते हैं।
अपने मौलिक विचारों को पेश करने की इसी अदा ने आशीष नंदी को दुनिया के सिरमौर समाज-विज्ञानियों में एक बनाया है। उनकी कल्पना गरुड़ की तरह उड़ान भरकर ज्ञान के उस विशाल मैदान (अब तक अज्ञात) में पहुंच का झंडा गाड़ आती है, जिसके बारे में शेष समाज-विज्ञान अभी अटकल-पच्चीसी से ही काम चला रहा होता है।
जयपुर में त्रासदीनुमा प्रहसन इसी शैली से अनभिज्ञता की वजह से घटित हुआ।
उन्होंने जो तर्क दिया, उसे मैं उनके मुंह से पहले भी सुन चुका हूं। जब भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण कैमरे में घूस लेते हुए कैद कर लिए गए और मायावती और लालू यादव के बारे में भी भ्रष्टाचार की बातें कही जा रही थीं, तब मध्यवर्गीय भद्रता को चुनौती देते हुए आशीष नंदी ने यह तर्क पेश किया था।
उन्होंने कहा कि अगड़ी जाति वाले, शहरी और अंग्रेजी बोलने वाले नेता-नौकरशाहों को तो निकृष्ट से भी निकृष्टतम भ्रष्टाचार करने के तरीके हासिल हैं, मगर उनका सामाजिक ताना-बाना इतना बढ़ा-चढ़ा है कि उसमें उनकी काली कमाई छिप जाती है। उन्हें क्या जरूरत पड़ी है कि घूस में नकदी लेने का जोखिम उठाएं, उनके लिए बस इतना भर इशारा करना काफी होता है कि अमेरिका में मेरा जो भतीजा पढ़ रहा है उसकी पढ़ाई के खर्चे को देख लीजिएगा।
कई साल से आशीष नंदी का यह कहना है कि पुराना सवर्ण अभिजन और वंचित समुदायों के बीच से उभरने वाला नया अभिजन, दोनों ही भ्रष्ट हैं- लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि सवर्ण अभिजन तो छुट्टा घूमता है, पर वंचित समुदायों के बीच से आने वाला नया अभिजन पकड़ा जाता है। वह यह भी कहते हैं कि समाज का वंचित तबका, अतीत में अपने साथ हुई नाइंसाफी का हर्जाना भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी करके वसूल रहा है। समाज को समतोल करने का एक तरीका यह भी है।
कमोबेश यही बात आशीष नंदी ने जयपुर-जलसे में कही। साथी वार्ताकार तरुण तेजपाल ने कहा कि भ्रष्टाचार समाज में बराबरी लाने वाले औजार की तरह काम कर रहा है। आशीष दा ने उनकी बात पर हामी भरी और कहा, 'भले यह बात ओछी और अश्लील जान पड़े, पर तथ्य यह है कि कई भ्रष्ट ओबीसी और अनुसूचित जाति के हैं और अब इसमें अनुसूचित जनजाति के लोगों की भी संख्या बढ़ रही है।
जब तक ऐसा है, तब तक मैं गणतंत्र के प्रति आशावान हूं।' यदि सिर्फ पहला वाक्य पढ़ें, तो वह जातिवादी आग्रहों और आघात से भरा जान पड़ेगा। पर उसी वाक्य को दूसरे वाक्य से जोड़कर और एक संदर्भ के साथ पढ़ें, तो एक नितांत अलग निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।
दरअसल अगर जुबान की फिसलन को भूलकर उनकी बात को रखा जाता, तो उसे इस रूप में भी पढ़ सकते हैं, 'भले ही यह तनिक ओछी और अश्लील बात जान पड़े, लेकिन यह तथ्य है कि जो पकड़े जाते और मीडिया के द्वारा सार्वजनिक निंदा का पात्र समझे जाते हैं, उनमें ओबीसी और अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या अनुपात से ज्यादा है और इसमें अब अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या भी बढ़ रही है।
इस तरह, भ्रष्टाचार अनजाने में ही सही, एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह भूमिका है, वंचित तबके के साथ अतीत में हुई नाइंसाफी का हर्जाना चुकाने की। जब तक हर्जाना चुकाने का यह औजार बरकरार है, मैं गणतंत्र के प्रति आशावान हूं।' यही बात आशीष नंदी ने स्पष्टीकरण में भी कही है।
आप उनसे असहमत हो सकते हैं। मैं खुद असहमत हूं ही। भ्रष्टाचार के बारे में यह तर्क कि वह अतीत में हुए अन्याय के लिए हर्जाना चुकाने का औजार है, असल में दलित-चिंतक चंद्रभान प्रसाद की सोच के करीब बैठता है, जो कहते हैं कि पूंजीवाद और अंग्रेजी के आने से दलितों की मुक्ति का रास्ता खुला। यह तर्क न तो तथ्यसंगत है और न ही युक्तिसंगत। पर यह कहना कि नंदी की सोच अनुसूचित जाति/जनजाति/ओबीसी के विरुद्ध है, या उन्होंने वंचित तबके पर जातिवादी आग्रहों के कारण लांछन लगाया है- उनकी बातों का भयानक कुपाठ करना है।
अफसोस की बात यह है कि प्रवंचना का यह अभियान दलित, आदिवासी और ओबीसी के नाम पर हो रहा है। जिन्हें सदियों तक सामाजिक-सेंसरशिप झेलनी पड़ी, अब वे ही सामाजिक-सेंसरशिप को अपना औजार बना रहे हैं। व्यंग्य, वक्रोक्ति और ताना-उलाहना कमजोर तबकों के समयसिद्ध हथियार रहे हैं और अब इन्हें ही सामाजिक न्याय के नाम पर सार्वजनिक जीवन से विदा करने की मांग हो रही है।
इस बात की वजह से यह प्रकरण बहुत त्रासद बन पड़ा है। असल त्रासदी यह है कि दलित-बहुजन समाज के नेताओं और हमदर्दों के लिए अपने दोस्त और दुश्मन में भेद कर पाना, कौन सी बात उनके हित में काम कर सकती है और कौन सी बात उनके हितों के विपरीत जा सकती है, इसे अलगा पाना कठिन होता जा रहा है। बकौल आशीष नंदी सामाजिक रूप से वंचित होने का सबसे बड़ा अभिशाप तो यही है।