और किसी मामले में तो नहीं, पर मुआवजा देने में हमारी सरकार लाजवाब है। कई बार तो ऐसा लगता है कि दुर्घटना से पहले ही मुआवजा तैयार रखा था। सरकार के कान में जैसे ही दुर्घटना शब्द गूंजता है, उसके मुंह से मुआवजा निकल पड़ता है। किसी दिन सरकार इतनी भी तत्परता न दिखा दे कि दुर्घटना बाद में हो और मुआवजा पहले अनाउंस हो जाए!
दुर्घटना से मुआवजे का रिश्ता अटूट है। चूंकि, दुर्घटना रोकने के लिए सरकार के पास समय और समझ नहीं है, इसलिए वह झट मुआवजे वाली बात पर आ जाती है। मैंने तो आज तक ऐसा नहीं सुना कि कोई हादसा हुआ हो...और सरकार ने कह दिया हो कि मुआवजा नहीं दिया जाएगा। सरकार इस मामले में इतनी उदार रहती है कि वह समय खर्च नहीं करती। मुआवजा देने का फायदा यह होता है कि जिन्हें मिलना है, वे ज्यादा चीख-पुकार नहीं करते और मुआवजे के चक्कर में उलझ जाते हैं।
मुआवजा देने का यह मतलब कतई नहीं है कि सरकार ने कहा और हाथोंहाथ दे दिया। मुआवजा पाने के चक्कर में अच्छे-अच्छे घनचक्कर हो जाते हैं। ऐसा भी हुआ कि पहला मुआवजा मिला नहीं और दूसरे हादसे का शिकार हो गए। अब दो-दो मुआवजे के लिए एक ही आदमी जूझ रहा है। सरकार भी उसे कभी इस मुआवजे के लिए झुलाती है, तो कभी उस मुआवजे के लिए। ऐसा भी होता है कि इस झूले में वह उस जगह पहुंच जाता है, जहां मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।
जब सरकार किसी हादसे के बाद मुआवजा घोषित करती है, तो वह अपनी ही गर्दन बचा रही होती है। मुआवजा देने की बात कहकर सरकार खुद मुआवजा पा जाती है। मुआवजा देते ही सरकार के सारे पाप धुल जाते हैं। सरकार भी निश्चिंत हो जाती है कि मुआवजा दे तो दिया...! अब क्या मरें? हादसे के शिकार को मुआवजा मिल ही जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है, पर मुआवजे के जरिये सरकार को मोहलत मिल जाएगी। तभी तो सरकारें दुर्घटना रोकने से ज्यादा बजट मुआवजे के लिए रखती हैं। सरकार बची रहेगी...तो मुआवजे की कोई कमी नहीं रहेगी।