बात पते की है और बहुतों को पता भी है, पर प्रमुख राजनीतिक दलों की दुरभिसंधि के चलते हमारे राजनेताओं का एक बड़ा वर्ग इस बाबत प्रायः मौन साधे है।
लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 बताती है कि किसी क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए संबंधित व्यक्ति का सामान्य तौर पर उस क्षेत्र का निवासी होना जरूरी है, पर हमारे कुछ विशिष्ट सांसदों के नाम उन राज्यों की मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, जहां सामान्य तौर पर वे कभी रहे ही नहीं।
महज एक हलफनामा देकर इन सांसदों ने अपने नाम अपने सामान्य निवास से इतर राज्यों की मतदाता सूचियों में दर्ज करा रखे हैं। इन विशिष्ट सांसदों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा संसदीय दल के प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं।
लंबे समय से दोनों का सामान्य निवास दिल्ली में है और यहां उनकी परिसंपत्तियां भी हैं, पर उनके नाम असम और गुजरात की मतदाता सूचियों में दर्ज हैं। मनमोहन सिंह का परिवार देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर पंजाब में बसा था। उनकी पढ़ाई-लिखाई पंजाब और चंडीगढ़ में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वह इंग्लैंड भी गए।
प्राध्यापक और अर्थशास्त्री के रूप में मनमोहन सिंह का करियर पंजाब, मुंबई और दिल्ली में बीता। 1991 में तत्कालीन प्रधानममंत्री पीवी नरसिंह राव ने जब उन्हें अपना वित्त मंत्री बनाने का फैसला किया, तब भी वह दिल्ली में रह रहे थे। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने गुवाहाटी स्थित अपने निजी मकान के पते पर उनका नाम मतदाता सूची में जुड़वा कर उनके राज्यसभा सदस्य बनने का रास्ता बनाया।
मनमोहन सिंह जैसी कहानी लालकृष्ण आडवाणी की भी है। आडवाणी देश विभाजन के बाद पाकिस्तान के कराची से भारत आए थे। वह पहले कुछ वर्ष राजस्थान में रहे, फिर दिल्ली आ गए। आडवाणी 1970 में पहली बार दिल्ली से राज्यसभा के लिए चुने गए।
1976 में वह गुजरात से उच्च सदन में आए और फिर 1982 व 1988 में मध्य प्रदेश से। उनकी सुविधा से उनका नाम कभी गुजरात और कभी मध्य प्रदेश की मतदाता सूची में जोड़ा जाता रहा। फिलहाल उनका नाम गुजरात की मतदाता सूची में दर्ज है और 1989 से वह चार बार गांधीनगर से लोकसभा के लिए चुने भी गए हैं।
मनमोहन सिंह और आडवाणी की राह पर चलने वालों में लोकसभा में भाजपा की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में भाजपा के नेता अरुण जेटली भी शामिल हैं। हरियाणा के अंबाला में जन्मी सुषमा ने राजनीतिक जीवन हरियाणा से ही शुरू किया।
वहां वह 1977 में महज 25 वर्ष की उम्र में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री भी बनीं। सुषमा ने 1980, 1984 और 1989 का लोकसभा चुनाव हरियाणा के करनाल से लड़ा, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में वह दिल्ली में बस गईं, पर 1990 में पहली बार राज्यसभा में उत्तर प्रदेश से पहुंची-वहां की मतदाता सूची में नाम दर्ज करा के।
सुषमा ने 1996 और 1998 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से जीत दर्ज की और वाजपेयी सरकार में मंत्री रहने के बाद अल्पकाल के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री भी बनीं। फिर 2000 में उत्तराखंड की मतदाता सूची में नाम जुड़वा कर वहां से राज्यसभा में पहुंचीं। इसके पहले उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक के बेल्लारी से सोनिया गांधी को भी चुनौती दी।
वर्तमान में वह मध्य प्रदेश के विदिशा से लोकसभा की सदस्य हैं और उनका नाम भोपाल की वोटर लिस्ट में जुड़ा है। जेटली तो दिल्ली में जन्मे, पले-बढ़े और यहीं छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। उनका अब तक का पूरा जीवन दिल्ली में ही बीता है, पर उनका नाम अहमदाबाद की मतदाता सूची में दर्ज है। वहां से वह तीन बार राज्यसभा के सदस्य चुने जा चुके हैं।
भाजपा के ही एक और दिग्गज वेंकैया नायडू की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हैदराबाद और दिल्ली रहा है, पर उनका नाम कर्नाटक के बंगलूरू की वोटर लिस्ट में है और वहीं से वह राज्यसभा के सदस्य हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो राज्यसभा सदस्यों- तारिक अनवर और डीपी त्रिपाठी की राजनीतिक कर्मस्थली बिहार और उत्तर प्रदेश रही है, मगर उनके नाम मुंबई की वोटर लिस्ट में हैं।
हैदराबाद में जन्मे और ताउम्र दिल्ली में बैठकर राजनीति करने वाले माकपा के सीताराम येचुरी का नाम कोलकाता की वोटर लिस्ट में है और वह पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सदस्य हैं। दिल्ली में पले-बढ़े अकाली दल के राज्यसभा सदस्य नरेश गुजराल का नाम पंजाब के लुधियाना की वोटर लिस्ट में है।
दरअसल 2003 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन से पहले राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारी के लिए संबंधित व्यक्ति का उस राज्य का मतदाता होना जरूरी था, जहां से वह चुनाव लड़ रहा हो। इस कारण अपने कुछ बड़े नेताओं को उच्च सदन में भेजने के लिए प्रमुख पार्टियां उनके नाम उन राज्यों की मतदाता सूची में दर्ज कराती रही हैं, जहां सामान्य तौर पर वे कभी रहे ही नहीं।
लोक प्रतिनिधित्व कानून में 2003 में संशोधन होने के बाद राज्यसभा की उम्मीदवारी के लिए जरूरी नहीं रहा कि संबंधित व्यक्ति का नाम उस राज्य की मतदाता सूची में शामिल हो। फिर भी, कुछ बड़े नेता अपने सामान्य निवास से इतर राज्यों की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की जुगत करते आए हैं। संभवतः सामान्य निवास की परिभाषा सुस्पष्ट न होने के कारण ऐसा हो रहा है। क्या सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग को इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए ठोस उपाय नहीं करने चाहिए?