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साथ चलो वरना रास्ते से हट जाओ

Wed, 14 Jan 2015 07:57 PM IST
अजय सिंह
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अपने अटल निश्चय को अंग्रेजी में व्यक्त करने का एक मुहावरा है- विद यू, विदाउट यू, इन स्पाइट ऑफ यू यानी आपके साथ, आपके बिना, आपके विरोध के बावजूद। इस बार के वाइब्रेंट गुजरात की अगर कोई प्रमुख थीम रही, तो यही थी। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभिव्यक्ति को साफ तौर पर रखा। अंतरराष्ट्रीय उद्योग जगत और नेतृत्व के सामने उन्होंने एक आर्थिक खाका रखा, जो उनके 'मेक इन इंडिया' की अवधारणा के अनुरूप था। इसके कई प्रमुख कारण थे। पिछले आठ महीनों में आर्थिक विषयों पर प्रगति प्रधानमंत्री के वायदों से मेल नहीं खाती है। कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश खुलने के बाद भी पूंजी का आगमन धीमा है। वैश्विक आर्थिक हालात भी संकट के दौर में है। यानी विदेशी पूंजी के भारत आने की राह में कई चुनौतियां हैं। इसलिए मोदी ने साफ तौर पर कहा कि उदारीकरण का दौर जारी रहेगा।
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मगर यह भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय उद्योग सिर्फ वायदों पर विश्वास नहीं करता। यही वजह है कि कोई भी विदेशी उद्योगपति भारत के विषय में रतन टाटा के बयान को दोहराते नहीं दिखा। वर्ष 2007 में टाटा ने कहा था कि 'आप मूर्ख हैं, अगर आप गुजरात में नहीं हैं।' ऐसा बयान भारत के विषय में किसी भी अंतरराष्ट्रीय उद्योगपति ने नहीं दिया। इसके उलट विश्व बैंक के अध्यक्ष ने जो विषय उठाया, वह था- इज ऑफ डूइंग बिजनेस (व्यापार करने में आसानी)। क्योंकि भारत ऐसे देशों में शुमार है, जहां व्यापार करना कठिन है।

ऐसे में प्रधानमंत्री का बार-बार यह आश्वासन, कि स्थितियां बदलेंगी, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए कर्णप्रिय था। यह आश्वासन एक खोखली बयानबाजी नहीं है, इसे जताने के लिए प्रधानमंत्री ने एक कठोर संदेश भी दिया कि किसी भी प्रकार का विरोध इस आर्थिक यात्रा को रोक नहीं पाएगा। भले ही अध्यादेशों के जरिये किए जा रहे आर्थिक सुधारों पर संशय हो, क्योंकि राज्यसभा में सरकार अल्पमत में है। मगर यदि मोदी का संदेश पढ़ा जाए, तो साफ था कि यह गतिरोध इन सुधारों को नहीं रोक पाएगा।
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मंच से उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी स्पष्ट संदेश दिया। हाल ही में विधानसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में अधिकतर राज्यों में भाजपा का ही शासन होगा। यह स्थिति राज्यों के स्तर पर व्यापक गतिरोध खत्म कर देगी। यानी ज्यादातर राज्य केंद्र की आर्थिक राह पर ही चलेंगे। एकीकृत कर व्यवस्था पर आग्रह इसी आर्थिक उदारीकरण का परिणाम है। जाहिर है, ऐसे में जो राज्य विरोध करेंगे, वे विकास की गति में पिछड़ेंगे। हालांकि मोदी कई तरह की आंतरिक चुनौतियों से भी जूझ रहे हैं, क्योंकि भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन मोदी की इस आर्थिक परिकल्पना से सामंजस्य रखते नहीं दिखते हैं। मगर इन चुनौतियों से भी वह पार पा लेंगे।

यह निर्विवाद है कि वाइब्रेंट गुजरात जैसे बड़े आयोजनों में दिशा-निर्देश पर काम ही होता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ उद्योगपतियों को बैठाकर प्रधानमंत्री ने बदलते भारत की तस्वीर पेश की, और गुजरात मॉडल की प्रासंगिकता भारत के संदर्भ में बताई। उन्होंने इस मॉडल के विरोधियों को साफ संदेश भी दिया कि अगर चलना है, तो साथ चलो, वरना रास्ते से हट जाओ।
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-लेखक गवर्नेंस नाउ पत्रिका के संपादक हैं
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