चार चरणों के मतदान के बाद ऐसा लगता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने का जो साहसिक फैसला लिया था, वह उत्तर प्रदेश में जमीन पर काम कर रहा है। जमीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि जाटवों का बसपा का मूल आधार आश्चर्यजनक रूप से सपा के यादवों के साथ सहयोग कर रहा है, जबकि अधिक दिन नहीं हुए वह इन्हें उत्पीड़क के रूप में देखता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटवों के एक और पूर्व उत्पीड़क जाटों के एक बड़े वर्ग और एकजुट मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से देश के सबसे अधिक आबादी वाले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में जो सामाजिक समूहों का असाधारण गठबंधन बना है, वह मोदी के रथ को रोक सकता है और 2019 के लोकसभा चुनाव में गेम चेंजर साबित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में दशकों के उतार-चढ़ाव से भरे सफर के बाद बहनजी ने अपना रुख बदलकर इस विश्वास के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया कि इससे उनकी पार्टी की संभावनाएं मजबूत होंगी। लिहाजा यह गठबंधन दलित नेता का एक बड़ा दांव है और अब तक इसे मिली सफलता मायावती के लिए सुखद आश्चर्य है और वह कभी राजनीतिक शत्रु रहे दूसरी पार्टी के नेता के साथ मंच साझा करने में असहज महसूस नहीं कर रही हैं। संयुक्त रैलियों में उनकी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की देह भाषा में यह साफ झलक भी रहा है।
इस गठबंधन की सफलता की असली वजह दोनों नेताओं की निजी केमिस्ट्री नहीं, कुछ और है। लखनऊ में दलित कार्यकर्ता, सपा के मध्य क्रम के नेता और स्वतंत्र राजनीतिक पंडित इस बात पर एकमत थे कि जमीनी मजबूरी ने उन्हें गठबंधन के लिए विवश किया। उत्तर प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ पर्यवेक्षक और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रमेश दीक्षित जोर देकर कहते हैं, यह ऐसा गठबंधन है, जिसे खुद लोगों ने तैयार किया है और गठबंधन के नेता उनके दम पर ही इसे आगे बढ़ा रहे हैं। दलित कार्यकर्ता और डायनामिक ऐक्शन ग्रुप के संस्थापक राम कुमार कहते हैं, 'बसपा समर्थकों का दबाव था कि पार्टी भाजपा के तमाम विरोधियों से हाथ मिलाए और अभी यादवों और जाटों के बीच की कड़वाहट मायने नहीं रखती।'