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एक सपने का जमींदोज हो जाना

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Fri, 20 Jul 2018 07:44 PM IST
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इमारत ध्वस्त

घर खरीदना एक ऐसी आकांक्षा है, जो गरीब या अमीर, हरेक भारतीय को समान स्तर पर लाती है। वर्षों से संपन्न लोग इस सपने को आसान कर्ज, शहरी अचल संपत्ति के विकास में तेजी और मकान के मालिकाना हक से मिलने वाली कर छूट के कारण साकार करते रहे हैं। शहरी क्षेत्रों के तेजी से विकास के कारण जमीन की कीमत आसमान छू रही है, जिसने निम्न और मध्यवर्गीय लोगों के अपने घर के सपने को मुश्किल बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में इस स्थिति में बदलाव आया, जब सरकार ने सभी के लिए आवास की अपनी पहल के तहत इस क्षेत्र में बड़े पहलों की घोषणा की। सरकार ने वर्ष 2022 तक सबके लिए आवास की योजना को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) की शुरुआत की, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूह के अलावा मध्य आय वर्ग की आवास जरूरतें पूरी करता है। पीएमएवाई के तहत पहली बार घर खरीदने वालों के लिए कर प्रोत्साहन की भी व्यवस्था है और वे शहरी इलाकों में 12 लाख रुपये तक के कर्ज पर ब्याज में छूट के पात्र होंगे।



पीएमएवाई के पीछे सरकार का यह विचार भी है कि आवास क्षेत्र को बिचौलियों और भ्रष्टाचार से मुक्त किया जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि लाभार्थियों को बिना परेशानी के घर मिल जाए। इसमें अवसर भांपकर बिल्डर और रियल एस्टेट डेवलपर्स ने देश भर में बड़े पैमाने पर ऐसे आवास निर्माण का काम शुरू कर दिया, जो पीएमएवाई की आवश्यकताओं के योग्य हो। कर्ज देने वाली एजेंसियों ने बढ़ती मांग के कारण बड़े पैमाने पर ऋण की मंजूरी दी। यह 2006-10 के बीच के अनुभव की तुलना में एक अलग प्रकार का रियल एस्टेट उन्माद है, जब हर कोई कीमतें बढ़ने के बावजूद घरों की बुकिंग करवा रहा था, नतीजतन हाउसिंग मार्केट का बुलबुला फूट गया।


गुणवत्ता को अलविदा-अगर कोई पीएमएवाई के तहत स्वीकृत ऋणों की संख्या और निर्माण व अधिगृहीत इकाइयों की संख्या को देखे, तो यह योजना सफल लगती है और इसके अनेक लाभार्थी हैं। रियल एस्टेट अधिनियम साल भर से कुछ ज्यादा समय पहले ही अस्तित्व में आया है और कई पीएमएवाई परियोजनाएं रेरा (रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 ) से मंजूर हैं, पर निर्माण की गुणवत्ता चिंता का विषय है। उदाहरण के लिए, ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में इमारत के पतन के ताजा मामले ले सकते हैं, जहां पीएमएवाई मॉडल पर एक निर्माणाधीन इमारत पहले गिरी और उसने अपने साथ दूसरी छह मंजिली इमारत को गिरा दिया, जहां हाल ही में लोगों ने रहना शुरू किया था।


सबको आवास देने की भव्य परियोजना में सरकार ने निर्माण एवं सुविधाओं की गुणवत्ता को लेकर आंखें मूंद ली। आवास की प्रमुख कीमत उस जमीन की कीमत होती है, जिस पर उसे बनाया गया है, पीएमएवाई के तहत ज्यादातर आवास शहरी इलाकों की परिधि में पनप रहे हैं, जहां भार सहन करने के लिए भूमि की गुणवत्ता की जांच नहीं की जाती, बाद में आने वाले भूकंप के झटकों को तो भूल ही जाइए। दूसरी ओर घर का सपना देखने वालों को अपने रोजमर्रा के जीवन में कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं, और बिल्डर गुणवत्तापूर्ण निर्माण मानकों का पालन न करके उनका शोषण करते हैं। चूंकि शाहबेरी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में है, इसलिए इसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया और बड़े पैमाने पर चिंता हुई। यही कहानी अन्य राज्यों की भी है, क्योंकि किसी ने भी उन लोगों के जीवन के बारे में नहीं सोचा, जो इन घरों में रहेंगे।

 

मानक सुनिश्चित करें-संयुक्त राष्ट्र में एक कार्यक्रम के दौरान आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि हर साल 70 से 90 करोड़ वर्ग मीटर शहरी स्थल बनाने की जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अब भी 2030 तक जरूरी 70 फीसदी नई आधारभूत संरचना की जरूरत है और यह पर्यावरण अनुकूल एवं लचीली होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने इस तरह के बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के दौरान सुरक्षा मानदंडों की गुणवत्ता का कोई उल्लेख नहीं किया। यह सचमुच दुखद है कि रियल एस्टेट क्षेत्र में इतनी गड़बड़ी और अराजकता के बाद एक आवास नियामक बनाया गया, और वह भी राज्य और केंद्र सरकार के बीच मिश्रित जवाबदेही के साथ।


अगर कोई पश्चिमी देशों में निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए मंजूर आवासीय परियोजनाओं को देखे, तो पाएगा कि वहां गुणवत्ता से शायद ही कभी समझौता किया जाता है। वास्तव में, ऐसी परियोजनाओं के लिए परिभाषित स्थान को देखते हुए मानक डिजाइन एवं गुणवत्ता सुनिश्चित की जानी चाहिए है और डेवलपर्स को इसका पालन करना चाहिए। इससे गुणवत्ता और डिजाइन संबंधी खामियां दूर होंगी। निर्माण के समय प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर भी गुणवत्ता की जांच की जा सकती है। अगर पीएमएवाई के तहत बनने वाले घर अच्छी तरह से योजनाबद्ध हों, तो इससे वे पर्यावरण के अनुकूल भी हो जाते हैं, जिससे ऐसे आवासों में लंबे समय तक ऊर्जा संरक्षण में मदद मिलेगी और रख-रखाव भी सही होगा।

 

इसके अलावा परिषद स्तर पर शहरी स्थानीय निकाय को निर्माण में उपयोग की जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता की जांच का अधिकार दिया जाना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष को इसकी जांच की जिम्मेदारी देने के बजाय रेरा के तहत सरकारी निकाय इसके लिए उत्तरदायी होगा। पीएमएवाई की सफलता के लिए सिर्फ ऋण की मंजूरी और निर्मित इकाई की संख्या ही पर्याप्त नहीं है। पीएमएवाई के तहत आवास की गुणवत्ता, उनमें रहने वाले लोगों की सुरक्षा और घर खरीदने वालों को उपलब्ध सुविधाएं प्रमुख कारक हैं, जो इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार ने उनके लिए क्या किया है। चूंकि हमारे चारों तरफ शहरीकरण हो रहा है, इसलिए अभी यहां हाउसिंग सेक्टर में उछाल कायम रहेगा। आवास की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए यही समय है कि आवास विकास मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए कि किफायती घरों की खराब गुणवत्ता के कारण और किसी की जान न जाए। यही बात उधारदाताओं के लिए लागू होती है, जिन्हें घरों के निर्माण के समय गुणवत्ता मानकों का पालन करने के लिए कुछ स्वामित्व भी लेना चाहिए।

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