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शीतयुद्ध: एक हत्या और एक किरदार, 65 साल बाद भी कायम है जिसपर राज

स्टुअर्ट ए रीड, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: Pavan Updated Sun, 05 Apr 2026 07:53 AM IST

सार

कांगो के पहले लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता पैट्रिक लुमुम्बा को सत्ता से हटाना और 1961 में हुई उनकी हत्या शीत युद्ध के सबसे बड़े अपराधों में से एक था। यह एक ऐसी साजिश थी, जिसमें व्हाइट हाउस के अधिकारी, सीआईए के जासूस, संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक, कांगो के अलगाववादी और हां, बेल्जियम के दूत भी शामिल थे। इसने एक युवा और करिश्माई नेता की जिंदगी को असमय ही खत्म कर दिया। उसकी जगह एक भ्रष्ट तानाशाह को बिठा दिया गया।
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शीत युद्ध, एक हत्या और कई किरदार - फोटो : अमर उजाला


लुमुम्बा को सत्ता से हटाना और उनकी हत्या करना शीत युद्ध के दौरान हुए सबसे बड़े अपराधों में से एक था। यह एक ऐसी साजिश थी, जिसमें व्हाइट हाउस के अधिकारी, सीआईए के जासूस, संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक, कांगो के अलगाववादी और हां, बेल्जियम के दूत भी शामिल थे। इसने एक युवा और करिश्माई नेता की जिंदगी को असमय ही खत्म कर दिया। उसकी जगह एक भ्रष्ट तानाशाह को बिठा दिया गया। उसने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो को बर्बादी के ऐसे रास्ते पर धकेल दिया, जिससे वह आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। कांगो के लोगों के अलावा और किसी को इसकी कभी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ी। न तो अमेरिका और न ही संयुक्त राष्ट्र ने औपचारिक रूप से माफी मांगी है। 2002 में, बेल्जियम के विदेश मंत्री ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह ‘सरकार के कुछ सदस्यों और उस समय के बेल्जियम के कुछ लोगों’ का दोष है। बेल्जियम की अदालत का फैसला असली न्याय का एक कमजोर विकल्प है।


आरोपी 93 वर्षीय डेविग्नन, इन सबमें एक छोटी-सी भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे। वह करीब एक दर्जन बेल्जियम अधिकारियों की उस सूची में अकेले जीवित बचे हैं, जिन पर लुमुम्बा परिवार ने हत्या के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया है। लुमुम्बा की हत्या के बाद बीते 65 वर्षों में, उनके देश पर भ्रष्ट और गैर-जिम्मेदार नेताओं ने अक्सर विदेशी संरक्षकों के समर्थन से शासन किया है। कांगो की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा रोजाना तीन डॉलर से भी कम पर गुजारा करता है। बाहरी ताकतें आज भी इसे हिंसा और बदहाली के एक स्रोत से ज्यादा कुछ नहीं मानतीं। साथ ही, खनिजों के एक स्रोत के तौर पर भी, जिनके मामले में कांगो बेहद समृद्ध है। 


लुमुम्बा की मौत उन्हें सत्ता से हटाने के लिए किए गए एक सुनियोजित और बड़े पैमाने पर विदेशी प्रयासों का ही परिणाम थी। वह एक अडिग राष्ट्रवादी थे, जिनकी पार्टी ने कांगो के पहले स्वतंत्र और लोकतांत्रिक चुनाव जीते थे। वह जून, 1960 में इस नव-स्वतंत्र देश के प्रधानमंत्री बने। कुछ ही हफ्तों के भीतर, सेना में विद्रोह और बेल्जियम-समर्थित खनिज-समृद्ध प्रांत कातांगा के अलग होने से कांगो संकट में घिर गया। अमेरिका में आइजनहावर प्रशासन को इस बात की चिंता थी कि लुमुम्बा सोवियत संघ के साथ हाथ मिला रहे हैं, इसलिए उसने प्रधानमंत्री की हत्या करने की सीआईए की योजना को मंजूरी दे दी। सीआईए का एक केमिस्ट जहर लेकर कांगो गया, पर यह साजिश कभी पूरी नहीं हो पाई। इसकी एक वजह यह भी थी कि तब तक, एक दूसरी योजना पर काम शुरू हो चुका था।


पांच सितंबर, 1960 को राष्ट्रपति जोसेफ कासावुबू, जो लुमुम्बा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे, ने घोषणा की कि उन्होंने लुमुम्बा को पद से हटा दिया है। इसके नौ दिन बाद, देश के 29 वर्षीय सेना प्रमुख कर्नल जोसेफ मोबुतु ने सीआईए-समर्थित एक तख्तापलट के जरिये सत्ता पर कब्जा कर लिया, और इस तरह दशकों तक चलने वाले कुशासन की शुरुआत हुई। आखिरकार, लुमुम्बा को राजधानी लियोपोल्डविल के बाहर एक सैन्य शिविर में हिरासत में ले लिया गया। लेकिन 1960 के अंत तक, देश के पूर्वी हिस्से में उनके समर्थक अपनी ताकत बढ़ा रहे थे, और आने वाला केनेडी प्रशासन अमेरिका की नीति को नरम बनाने की दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा था। केनेडी प्रशासन एक ऐसी नीति बनाना चाहता था, जिसमें शायद लुमुम्बा के शासन को बहाल करने वाला कोई समझौता भी शामिल हो सकता था।


जैसे ही कर्नल मोबुतु के गुट ने लुमुम्बा को किसी ऐसी जगह भेजने की योजना बनाई, जहां उनकी हत्या होना तय था, सीआईए के स्टेशन चीफ ने उसे हरी झंडी दे दी। 17 जनवरी, 1961 को कर्नल मोबुतु के सुरक्षा प्रमुख ने लुमुम्बा को सैन्य हिरासत से हटाकर कातांगा ले जाने का इंतजाम किया। उसी शाम, कई घंटों की यातना के बाद, बेल्जियम के अधिकारियों के नेतृत्व में कांगो के सैनिकों की एक टुकड़ी ने उन्हें गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। बाद में उनके शव को सल्फ्यूरिक एसिड से भरे एक बैरल में गला दिया गया। इस अत्याचार में डेविग्नन की भूमिका सीमित थी। 1960 की गर्मियों में, वह लियोपोल्डविल स्थित बेल्जियम दूतावास में 27 वर्षीय प्रशिक्षु राजनयिक थे। हालांकि, पद में कनिष्ठ होते हुए भी उनकी कांगो के राजनीतिक नेताओं तक सीधी पहुंच थी।


जब लुमुम्बा जेल में कष्ट भोग रहे थे, तब डेविग्नन ब्रसेल्स लौट चुके थे और बेल्जियम के विदेश मंत्रालय में ‘कांगो सेल’ के एक महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके थे। रिकॉर्ड से पता चलता है कि डेविग्नन को मालूम था कि लुमुम्बा को ऐसी जगह भेजा जा रहा है, जहां उनकी हत्या निश्चित थी। अगर इस बात का कोई सबूत है कि डेविग्नन की भूमिका इससे कहीं ज्यादा थी, तो वह अब तक सामने नहीं आया है। इसका मतलब यह नहीं है कि डेविग्नन की कोई जिम्मेदारी नहीं है। कम से कम, वह उस मशीन का एक पुर्जा तो थे ही, जिसने एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाने और उन्हें मौत के घाट उतारने में मदद की। या जैसा कि लुमुम्बा के परिवार ने कहा-उस जंजीर की एक कड़ी। 
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पैंसठ साल बीत जाने के बाद भी, लुमुम्बा की मृत्यु में एजेंसी की भूमिका से जुड़े सीआईए के दस्तावेजों में रिश्वत, सहयोगियों और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों से संबंधित कई हिस्से अब भी छिपे हुए हैं। लुमुम्बा की बेटी जुलियाना ने एक बार मुझसे कहा था कि बेल्जियम की तरफ से मिली आधी-अधूरी माफियों के बाद, उनसे अक्सर यह पूछा जाता है कि उन्हें और क्या चाहिए। उनका जवाब था-‘हमें सच चाहिए।’
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