बंदरपूंछ ग्लेशियर से आ रही यमुना उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से होते हुए 1,326 किमी चलकर प्रयागराज में गंगा से मिल जाती है। लेकिन इसके उद्गम से नीचे की ओर लगभग 60 किमी की दूरी तक बाढ़ और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील बन गया है। पिछले वर्षों से लगातार यमुनोत्री जाने वाले तीर्थ यात्रियों का मुख्य पड़ाव स्यानाचट्टी के पास कुपड़ा गाड़ से आ रहे मलबे ने तीन-चार बार यमुना के प्रवाह को रोककर झील बनाई है। इसके कारण स्यानाचट्टी और इसके आसपास कुपड़ा, कुनसाला समेत दर्जनों गांव के संपर्क कट जाते हैं और अभी तक यहां झील बनने का भय लोगों को रात-दिन सता रहा है।
ये गांव बार-बार पानी में डूब चुके हैं। अब भी कुपड़ा गाड़ से लगातार आ रहा मलबा यमुना में जमा हो रहा है और स्यानाचट्टी का निचला हिस्सा मलबे के नीचे दब रहा है। पिछले वर्षों की भीषण आपदा में जब झील बनी, तो प्रशासन और निर्माण एजेंसियों ने बड़ी मेहनत से जल निकासी की थी, जिसके बाद यहां मलबे के ऊंचे-ऊंचे ढेर जमा हुए, जो निचले क्षेत्रों की बर्बादी का कारण बन रहे हैं। बरसात छोड़कर साल के अन्य मौसम में देखेंगे, तो यमुना में पानी की मात्रा बहुत कम रहती है। इसका कारण यह भी है कि बंदरपूछ ग्लेशियर अन्य ग्लेशियरों की अपेक्षा तेजी से पिघल रहा है और यमुना को फीडबैक करने वाली छोटी नदियों में भी पानी निरंतर घट रहा है।
प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण का राज इस नदी पर वर्षों से बना हुआ है। यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर बड़कोट से आगे लगभग 24 किमी की दूरी तक भूस्खलन के लिए संवेदनशील बन चुकी भौगोलिक संरचना को नजरअंदाज करते हुए सड़क चौड़ीकरण के दौरान मिट्टी व बोल्डरों को सीधे यमुना में उड़ेला गया। सीधे खड़े पहाड़ों को जिस बेदर्दी से मशीनों ने काटा है, उसके कारण पहाड़ कम बारिश में ही टूटने लगते हैं। इससे आगे भी पालीगाड से जानकी चट्टी के बीच तीन और डेंजर जोन दिखाई दे रहे हैं और सिलाई बैंड, झझर गाड, जैसे अनेकों स्थानों पर पहाड़ दरकने का भय बना हुआ है। मसूरी से होते हुए यमुना पुल से जानकी चट्टी के बीच में छोटे-बड़े भूस्खलन जोन बने हुए हैं। यह पहाड़ों पर हुई अंधाधुंध छेड़छाड़ के परिणाम हंै। चौड़ी सड़क बनाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग और वन, पर्यावरण व जलवायु, नमामि गंगे और आपदा प्रबंधन के संबंधित मंत्रालयों के बीच तालमेल की कमी है। न तो ठीक से निगरानी होती है, और न भूगर्भविदों की सलाह पर ध्यान दिया जाता है।
यमुना के ऊपरी क्षेत्र में पर्यावरण विनाश की गतिविधियां हाल के वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ी हैं। उत्तराखंड में यमुना पर जितना संकट बढ़ रहा है, उससे कहीं अधिक मैदानी क्षेत्र में भी भीषण जल प्रलय के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। यमुनानगर के पास हथिनीकुंड बैराज से छोड़े जा रहे पानी से दिल्ली तक हर साल भयंकर बाढ़ देखने को मिलती है। 1996-99 में हथिनीकुंड बैराज का निर्माण किया गया था, जिससे पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर के द्वारा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश को पानी की आपूर्ति की जाती है।
मानसून के समय इसमें 38 हजार क्यूसेक से अधिक पानी जमा रहता है। जब इस बैराज में पानी भर जाता है, तो यहां से लगभग 20 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है, जो 48 से 72 घंटे के अंदर ही दिल्ली पहुंच जाता है। इस कारण दिल्ली व उत्तर प्रदेश के शहरों में बाढ़ के साथ अत्यधिक गंदा पानी और सीवर सीधे बस्तियों में घुस जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय व ईसर भोपाल द्वारा किए गए शोध बताते हैं कि यमुना का पाट करीब 68 प्रतिशत सिकुड़ गया है और बाढ़ वाले मैदान का एक तिहाई हिस्सा पूरी तरह गायब हो गया है।
इसका मतलब है कि मानसून के समय हथिनीकुंड बैराज का पानी जल प्रलय की स्थिति खड़ी कर देता है, लेकिन उसके बाद यमुना एक गंदे नाले के रूप में बहती है। यमुना में सीवर जैसे गंदे पानी का शोधन एसटीपी भी नहीं कर सकती है। यमुना के जलग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक भूजल का दोहन करके पेयजल के रूप में उपयोग करने से तरह-तरह की बीमारियों हो रही हैं। इससे महामारी फैलने का खतरा भी रहता है। बैराज और तटबंधों के निर्माण के साथ बढ़ते शहरीकरण के अवैध कब्जों ने फ्लड प्लेन खत्म कर दिया है।
यह स्थिति हथनीकुंड बैराज के बाद ही पैदा हो रही है। यमुना अपनी हजारों वर्ष पुरानी प्राकृतिक क्षमता लगभग खो चुकी है। गंगा की सबसे बड़ी नदी की जब यह हालात हो गई है, तो गंगा कैसे बचेगी? जहां गंगा-जमुनी संस्कृति व सभ्यता के अस्तित्व पर भीषण खतरा है, वहीं दूसरी ओर पानी का संकट भी बढ़ रहा है। इन ज्वलंत सवालों पर लंबे समय तक खामोश रहकर चंद समय की सुख-सुविधाओं से कुछ हासिल नहीं होगा।