गांधी जयंती के दिन शुरू किया गया स्वच्छ भारत अभियान संस्थानिक नियमों की उलझन सुलझाने का एक प्रेरक मॉडल बन सकता है। भारत में नीतियों, कानूनों, नियमों और विनियमों का ऐसा मकड़जाल फैला है, जिसने कारोबारी माहौल के लिहाज से भारत को विश्व बैंक की 189 देशों की सूची में 134वें लचर स्थान पर ला पटका है। नियमों का यह मकड़जाल तभी सुलझ सकता है, जब केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारें- सभी स्तरों पर प्रयास हों।
वर्ष 2025 तक विनिर्माण क्षेत्र में हमने अपनी हिस्सेदारी 15 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति की रफ्तार काफी धीमी है। वहीं, 144 देशों को लेकर तैयार की गई वैश्विक प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट में हमारी स्थिति 60 से गिरकर 71 पर आ गई है। इतना ही नहीं, एशियाई विकास बैंक की क्रिएटिव प्रोडक्टिव इंडेक्स में 24 बड़ी आर्थिक ताकतों में हमारा स्थान 14वां है। ये रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती हैं कि नियमों की बाधाएं, लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार की वजह से निजी क्षेत्र नवाचार में पूंजी लगाने से हिचक रहे हैं। और यह सर्वविदित है कि नवाचार के बिना विनिर्माण क्षेत्र उन्नति नहीं कर सकता।
मौजूदा दौर में बुनियादी ढांचा, वित्तीय क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवा सुधार जैसे कई अन्य क्षेत्रों में काम करने की जरूरत तो है ही, पर सबसे पहले उन बाधाओं को दूर करने की जरूरत है, जिससे किसी उद्यमी को नई फैक्टरी खोलने और चलाने के लिए रोजाना जूझना पड़ता है। लघु और मध्यम आकार की फैक्टरियों के लिए ऐसा किया जाना निहायत जरूरी है, क्योंकि बड़े निवेशक रसूख का फायदा उठाकर इससे जुड़ी समस्याओं को आसानी से सुलझा लेते हैं। आवश्यकता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रक्रिया को आसान करते हुए इसकी राह की बाधाओं को दूर करने की भी है। भारतीय निवेशक देश के अंदर ही निवेश कर सकें, इसके लिए भी माहौल बनना चाहिए, क्योंकि कोयला खदानों का आवंटन रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद एक सीईओ ने मुझसे कहा, 'यह वक्त मेक इन इंडिया का नहीं, रन फ्रॉम इंडिया का है।'
देश में कारोबारी माहौल स्वतः नहीं बन सकता। इसके लिए ढांचागत सुधार की जरूरत है। पहले झाड़ू उन शंकाओं पर लगाना होगा है, जो नई कंपनी की स्थापना के वक्त उठती है। मेक इन इंडिया की सफलता विनिर्माण क्षेत्र पर निर्भर है। ग्लोबल वैल्यू चेन का हमें हिस्सा बनना होगा, क्योंकि 60 फीसदी अंतरराष्ट्रीय व्यापार इसी तरीके से होता है, और यह तभी संभव है, जब हम विदेशी व्यापार और निवेश के लिए सीमा खोल दें। लाल फीताशाही पर भी झाड़ू चलानी होगी। उद्यमियों की परेशानियों के निवारण के लिए खाका तैयार करना और जरूरी प्रस्तावित बदलाव के विश्लेषण के लिए विनियामक प्रभाव आकलन की व्यवस्था जरूरी है।
सभी स्तरों पर शीर्ष नेतृत्व द्वारा मानसिकता बदलने की दिशा में भी अभियान चलाने की आवश्यकता होगी। जरूरत उस 'समानता' पर भी ध्यान देने की है, जो हमारे नौकरशाहों के शब्दकोश से गायब हो गया है, पर सबसे ज्यादा आवश्यकता हमारी नागरिक सेवाओं और तंत्रों में क्रांतिकारी बदलाव और ढांचागत सुधार की है।
(लेखक कट्स इंटरनेशनल के महासचिव हैं)