कक्षा में सन्नाटा खिंचा हुआ था। बच्चे सिर झुकाए बैठे थे। सर बहुत नाराज थे। हाथ में रूल लिए बैचेनी से टहल रहे थे।
पुअर, वेरी पुअर, सौ दिन हो गए क्लास शुरू हुए। कुछ नहीं हुआ। ‘मिनिस्टर’ क्लास में एडमिशन देते हुए सभी ने कहा था कि शानदार परफारमेंस देंगे। पर देखिए रिपोर्ट कार्ड, सब के सब जीरो।
विद्यार्थी चुप थे। क्या करते, अभी तीन महीने ही तो हुए थे। पहली बार ‘सत्ता’ स्कूल की ‘मिनिस्टर’ क्लास में थे। अभी मौज-मस्ती ही चल रही थी। फिर पांच साल के कोर्स में इतनी जल्दी भला कौन सबक याद करता है?
सर अब सभी से रिपोर्ट मांग रहे हैं। ‘विकास’ के पहाड़े याद किए या नहीं। ‘विकास’ के प्रैक्टिल करने को कहा था, उसका क्या रहा। बच्चे हतप्रभ हैं। अभी तो सौ की गिनती तक नहीं सीख पाए हैं, विकास के पहाड़े भला कहां से सीखेंगे! वह तो चुनाव एडमिशन के समय जनता प्रिंसिपल को इम्प्रेस करने के लिए कह दिया था कि इधर एडमिशन हुआ और उधर विकास की गंगा बहा देंगे। मगर यह तीन महीने तो ऐसे निकल गए कि पता ही नहीं चला। फिर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में चुनाव-परीक्षा में ही सबक पढ़ने की प्रथा रही है।
सर नाराज हो रहे थे। कितनी मुश्किल से एडमिशन मिला है। मेरी भी इच्छा है कि कम से कम दस साल मैं भारत कॉलेज का प्रिंसिपल बना रहूं। तुम लोग यदि ऐसे रिजल्ट दोगे, तो यहां कौन टिकने देगा! जनता को कितनी मुश्किल से गणित समझाई है। पहले हमने तो हर चीज में 'हां' कह दी, पर अब मुझे ही देखो क्या-क्या नहीं कर रहा हूं। जापान में जाकर ढोल बजाया। अब अमेरिका जा रहा हूं। लोग मुझे निरंकुश कहते हैं। आरोप लगा रहे हैं कि गृह मॉनीटर से मेरे संबंध अच्छे नहीं है। कितनी परेशानी है और तुम यहां बस आराम फरमा रहे हो। जल्दी सुधरो।
सर क्लास से चले गए। मंत्री विद्यार्थियों ने चैन की सांस ली। ठीक है देखेंगे, अगले टेस्ट में जमकर तैयारी करेंगे। और अगले टेस्ट तक भी कुछ नहीं हो पाया तो... चिंता की बात नहीं, उसके आगे आने वाला टेस्ट तो है ही।