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कुपोषण के विरुद्ध नागरिक प्रयास

भारत डोगरा
Updated Thu, 12 Dec 2019 05:25 AM IST
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कुपोषण - फोटो : PTI

देश से भुख और कुपोषण को स्थायी तौर पर दूर करना है, तो आर्थिक विषमता और अन्याय को कम करने के सार्थक प्रयास करना जरूरी है। हाल में इस चर्चा ने जोर पकड़ा है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कुपोषण दूर रखने वाला सबसे उचित भोजन-मिश्रण क्या हो। अपने देश की विशेष स्थितियों को देखते हुए हमें इस ओर समुचित ध्यान देना चाहिए कि ऐसे पौष्टिक खाद्य कौन से हैं, जो अपेक्षाकृत कम खर्च पर उपलब्ध हो सकते हैं। आंगनवाड़ी और मिड-डे मील जैसे सरकार के विभिन्न कार्यक्रम  चल रहे हैं, पर इनके क्रियान्वयन में अनेक कमियां हैं। सबसे निर्धन भूमिहीन परिवारों को थोड़ी-सी भी अपनी जमीन मिल सके, तो इससे भूख और कुपोषण दूर करने में सहायता मिलेगी। सरकारी नीतियां भूख और कुपोषण कम करने पर केंद्रित हों, यह तो जरूरी है ही, गैरसरकारी स्तर पर भी इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। कभी अनेक गैरसरकारी संगठन इस दिशा में सक्रिय थे, पर अब इनकी सक्रियता कम हुई है। चूंकि साधारण नागरिक प्रायः इन संस्थाओं के माध्यम से ही इन प्रयासों से अधिक जुड़ते थे, अतः उनकी भी सक्रियता कम हुई है।



लेकिन स्थिति की भयावहता को देखते हुए भूख और कुपोषण के विरुद्ध नागरिक प्रयास शुरू करने का समय फिर आ गया है। यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी क्षेत्र विशेष के फसल-चक्र और रोजगार उपलब्धि के अनुसार कौन से महीने या सप्ताह अधिक भूख व कुपोषण के हैं। सर्दियों में भूख की मार कुछ ज्यादा ही महसूस होती है। दिन छोटे होते हैं और गांवों से दिहाड़ी मजूदरी के लिए निकलने वालों के लिए रोजगार की संभावना कम हो जाती है। अतः इस मौसम में नागरिकों व नागरिक संगठनों को भूख व कुपोषण की मार कम करने के लिए अधिक सक्रिय हो जाना चाहिए।


नागरिक प्रयास अनेक रूप ले सकते हैं। मसलन, जिन गांवों या शहरी बस्तियों में निर्धनता अधिक व्यापक स्तर पर है, यानी लगभग सभी परिवार भूख से अधिक प्रभावित हैं, वहां के लिए फूड किट की व्यवस्था हो सकती है। इसके तहत एक परिवार के लगभग दस-पंद्रह दिनों के लिए अनाज, आलू (या दाल) नमक तथा बच्चों के लिए बिस्कुट आदि पैक किए जा सकते हैं। बस्ती के सभी परिवारों के लिए ऐसी व्यवस्था हो जाए, तो उन्हें निश्चय ही राहत मिलेगी। आखिर आपदाओं के समय प्रभावित लोगों के लिए ऐसी व्यवस्था की ही जाती है।


दूसरी व्यवस्था उन गांवों या बस्तियों के लिए उचित है, जहां कुछ विशेष परिवार भूख से पीड़ित हैं। इनके लिए गांवों में अनाज बैंक बनाया जा सकता है। गांव में एक पंचायत समिति गठित की जा सकती है, जो यह तय करे कि कौन से परिवार इस बैंक से अनाज ले सकते हैं। बाद में फसल आने पर कुछ परिवार चाहें, तो इस बैंक में अनाज लौटा सकते हैं। गांवों या बस्तियों में दिन में एक बार के भोजन के लिए रसोई की व्यवस्था भी हो सकती है, हालांकि दैनिक स्तर पर यह जिम्मेदारी संभालना कठिन हो जाता है। पर विशेष परिस्थितियों में पंचायतों या सरकारी स्तर पर ऐसा हो सकता है कि जब स्कूलों के लिए मिड डे मील बनता है, तभी वृद्धों, असहायों और जरूरतमंदों  के लिए भी भोजन तैयार किया जाए। चूंकि सरकार अपनी कल्याणकारी भूमिका से हटती दिखाई देती है तथा बाजारवादी आर्थिक नीतियों ने बड़ी संख्या में लोगों को हाशिये पर ला दिया है, इसलिए भी भूख और कुपोषण दूर करने के लिए स्थानीय और सामुदायिक स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है।

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