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नागरिक जीवन बनाम राजस्व

Mon, 17 Apr 2017 07:42 PM IST
सुधांशु रंजन
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सुधांशु रंजन
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अभी शराबबंदी का मसला सुर्खियों में है। उच्चतम न्यायालय द्वारा हाइवे पर शराब की दूकानें बंद करने का आदेश दिए जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सरकारों ने भी चरणबद्ध तरीके से शराब पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। कानून के कई जानकार उच्चतम न्यायालय के फैसले को न्यायिक फतवा की संज्ञा देते हैं। उनका तर्क है कि शराब पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार संविधान राज्य को देता है, न्यायालय को नहीं। इसकी 7वीं अनुसूची की दूसरी सूची का 8वां विषय इसी बारे में है।
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इसके विपरीत उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय का आधार संविधान के अनुच्छेद 21 को बनाया है, जो जीवन का अधिकार प्रदान करता है। न्यायालय का तर्क है कि शराब पीकर गाड़ी चलाने से दुर्घटनाएं होती हैं, जो कई बार मारक होती हैं। इससे दूसरों के जीवन का अधिकार प्रभावित होता है। इसकी रक्षा के लिए आवश्यक है कि नशे की हालत में गाड़ी चलाने पर रोक लगे और इस कारण हाइवे के किनारे शराब की बिक्री पर अदालत ने रोक लगाई। शराब पीकर गाड़ी चलाने से होने वाली दुर्घटनाओं के बारे में सरकार एवं विधायिका हाथ पर हाथ धरकर बैठी थी। कार्यपालिका तथा विधायिका की निष्क्रियता ही न्यायपालिका की सक्रियता का कारण बनती है।

उच्चतम न्यायालय के नशाबंदी के संबंध में दिए गए फैसले को लागू न करने के लिए कुछ राज्य सरकारें घिनौनी दुरभिसंधि में लग गई हैं। न्यायालय के आदेशानुसार किसी भी राष्ट्रीय या राज्य हाइवे से 500 मीटर की दूरी के दायरे में कोई मधुशाला नहीं होगी और न ही किसी रेस्टोरेंट में शराब परोसी जाएगी। राज्य सरकारों ने न्यायालय से इस पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि इससे उन्हें राजस्व की हानि होगी। पर न्यायालय ने जब संशोधन से इन्कार कर दिया, तो कुछ राज्य सरकारों ने कुछ हाइवे के कुछ हिस्से को उस श्रेणी से हटा दिया, ताकि शीर्ष अदालत का आदेश उस पर लागू न हो।
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संविधान का अनुच्छेद 47 स्पष्ट कहता है कि राज्य नशाबंदी लागू करने का प्रयास करेगा और केवल औषधीय कारणों से इसके सेवन की इजाजत दी जाएगी, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस अनुच्छेद में राज्य को लोगों के स्वास्थ्य का खयाल रखने का दायित्व सौंपा गया है। तत्कालीन बंबई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने 1949 में ही बंबई नशाबंदी कानून बनाया, जिसे उच्चतम न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। न्यायालय ने बंबई वनाम एफ एन बलसारा (1951) मामले में निर्णय दिया कि ऐसा प्रतिबंध किसी अधिकार का हनन नहीं है। परंतु अदालत ने उस कानून के कई प्रावधानों को असांविधानिक करार दिया और औषधि के रूप में अल्कोहल के इस्तेमाल की इजाजत दी।

नशाबंदी के आलोचकों का तर्क है कि कहीं भी यह कार्यक्रम पूरी तरह सफल नहीं हुआ। यह काफी हद तक सही है। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई सराहनीय प्रयास इसलिए छोड़ दिया जाए, क्योंकि उसमें विफलता हाथ लगती है। वैसे तो शीर्ष अदालत का ताजा निर्देश केवल हाइवे के लिए है, परंतु इसे पूरे देश में लागू करना बांछनीय होगा, क्योंकि मद्यपान के कई नुकसान हैं। दुर्घटना, गृहकलह, बीमारी, मानव संसाधन की क्षति से जो नुकसान होता है, उसके मुकाबले राजस्व की क्षति कुछ भी नहीं है। इसलिए उच्चतम न्यायालय का फैसला स्वागत योग्य है, जिसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
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