नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, देश की सभी अदालतों में 5.64 करोड़ से ज्यादा मामले अटके हुए हैं। उच्च न्यायालयों में भी 80,660 केस 30 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। ये आंकड़े महज न्यायिक व्यवस्था की सुस्ती की ही कहानी नहीं कहते, बल्कि उन करोड़ों लोगों की बेबसी की दास्तां भी बयान करते हैं, जो विचाराधीन कैदी के रूप में अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष जेल की सलाखों के पीछे गंवा देते हैं। अपनी बेगुनाही साबित करने में लोगों की जीवनभर की कमाई वकीलों की फीस और अदालतों के चक्कर काटने में खर्च हो जाती है।
आम तौर पर अदालतों में लंबित पड़े मामलों की सुनवाई तथा न्याय में देरी के लिए पर्याप्त संख्या में जजों, कर्मचारियों एवं आधारभूत संरचना की कमी का उल्लेख किया जाता है, लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से अब तक अदालतों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने और न्याय व्यवस्था में तकनीक को शामिल करने पर 9,800 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन इसका बहुत ज्यादा असर देखने को नहीं मिला है।
अक्सर देखा जाता है कि जांच एजेंसियां समय पर और सही तरीके से साक्ष्य जुटाने में विफल रहती हैं, तो कभी जजों की कमी के कारण सुनवाई टल जाती है। देश के उच्च न्यायालयों में 1,122 स्वीकृत पदों के मुकाबले 341 जजों के पद खाली हैं। निचली अदालतों में 30,868 स्वीकृत पदों के मुकाबले 7,311 पद रिक्त पड़े हैं।
कॉलेजियम सिस्टम की वजह से हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए तय समय-सीमा पर नामों की सिफारिश नहीं करने से भी जजों की नियुक्तियां अटकी रहती हैं। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने संबंधी विधेयक का लोकसभा में पारित होना एक महत्वपूर्ण पहल है। लेकिन, जब तक उच्च व अधीनस्थ न्यायालयों में रिक्त पद समयबद्ध तरीके से नहीं भरे जाते, न्यायिक आधारभूत ढांचे को मजबूत नहीं किया जाता और सरकार सहित सभी पक्ष अनावश्यक मुकदमेबाजी को कम करने का प्रयास नहीं करते, तब तक न्याय में देरी का संकट शायद ही दूर हो सके।