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चिन्मय कृष्ण दास रिहा होने चाहिए: यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं, इसके पीछे खतरनाक राष्ट्रीय संस्कृति

तस्लीमा नसरीन
Updated Wed, 16 Sep 2026 09:00 AM IST

सार

ढाका सरकार को चाहिए कि वह चिन्मय कृष्ण दास को तत्काल रिहा करे, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि इसके पीछे एक खतरनाक राष्ट्रीय संस्कृति है। बांग्लादेशी हुकूमत राजनीतिक विरोधियों पर जिस शक्ति का इस्तेमाल कर रही है, वही कल उसके खिलाफ भी की जा सकती है।
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चिन्मय कृष्ण दास (फाइल) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


अगस्त, 2024 में राजनीतिक बदलाव के बाद से ही बांग्लादेश के विभिन्न इलाकों में हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों पर हमले तथा हिंदू शिक्षकों के नौकरी छोड़ने की खबरें आने लगी थीं। इन सब के विरोध में चिन्मय कृष्ण दास ने आंदोलन शुरू किया था। उन्होंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने, अल्पसंख्यकों पर हमले में न्याय करनेे तथा हर्जाना देने जैसी मांग की थी। इस सिलसिले में चटगांव के लालदीघी में 25 अक्तूबर, 2024 को हुए विरोध प्रदर्शन का उन्होंने नेतृत्व भी किया था। 31 अक्तूबर को चटगांव के कोतवाली थाने में चिन्मय कृष्ण समेत 19 लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया।


इन लोगों पर आरोप क्या थे? लालदीघी में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान चटगांव न्यू मार्केट मोड़ के एक खंभे पर लगे बांग्लादेश के राष्ट्रध्वज पर भगवा ध्वज लगा दिया गया था। उसी के आधार पर इन लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया। इस मामले में वादी थे स्थानीय बीएनपी नेता फिरोज खान। मुकदमा दर्ज किए जाने के अगले दिन ही बीएनपी ने फिरोज खान को पार्टी से भी निकाल दिया। हालांकि, फैसले को बाद में वापस ले लिया गया। पर, एक सवाल रह ही जाता है कि देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का ठोस आधार क्या था।


बांग्लादेश हाईकोर्ट ने बाद में इस सवाल का जवाब दिया। लेकिन, उससे पहले ही चिन्मय कृष्ण के लिए आजाद घूमने का रास्ता बंद हो गया। 22 नवंबर, 2024 को उन्होंने रंगपुर में हिंदू समुदाय के एक बड़े आयोजन में हिस्सा लिया था। फिर, 25 नवंबर को जब वह चटगांव जाने के लिए ढाका के शाह जलाल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर पहुंचे, तो चटगांव मामले में उन्हें हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन उन्हें चटगांव की अदालत में पेश किया गया। वहां जमानत की अर्जी खारिज हो गई और उन्हें जेल भेज दिया गया। 25 नवंबर, 2024 से चिन्मय कृष्ण दास जेल में ही हैं।


सवाल यह है कि उन पर लगाया गया देशद्रोह जैसा गंभीर आरोप अदालत में क्या टिक पाता? 30 अप्रैल, 2025 को चिन्मय कृष्ण को जमानत देते हुए दो न्यायाधीशों ने जो राय दी, वह इसका उत्तर देती है। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इजहार में कहीं यह नहीं लिखा गया है कि राष्ट्रध्वज के ऊपर दूसरा ध्वज चिन्मय कृष्ण ने लगाया था। यहां तक कि झंडा लगाने की घटना जिस जगह हुई, वहां चिन्मय कृष्ण मौजूद थे, इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला। हाईकोर्ट की शब्दावली में भी चिन्मय कृष्ण द्वारा लोगों को भड़काए जाने की भाषा अस्पष्ट थी। अदालत ने कहा है कि झंडा लगाने वाला आरोप अगर सच हो, तो भी यह देशद्रोह के दायरे में नहीं आता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया है कि चिन्मय कृष्ण की गिरफ्तारी के बाद लंबा समय गुजर जाने के बावजूद, मुकदमे की जांच में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।


हाईकोर्ट ने चिन्मय कृष्ण को जमानत दे दी थी। लेकिन, क्या उन्हें रिहा किया गया? नहीं। हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल को देशद्रोह के मामले में उन्हें जमानत दे दी। लेकिन, पांच मई को उन्हें वकील सैफुल इस्लाम आलिफ की हत्या को मामले में गिरफ्तार बताया गया। छह मई को अदालत परिसर में तोड़फोड़ और पुलिस बल पर हमला के चार मामलों में उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया। हालांकि, इस वर्ष एक के बाद एक मामले में चिन्मय कृष्ण को जमानत मिलने लगी। फिर भी, उनकी रिहाई नहीं हो पाई। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान हुई थी। यानी, चिन्मय कृष्ण दास की स्थिति के लिए नई सरकार पूरी तरह जिम्मेदार नहीं है। पर, उसका काम यह भी नहीं है कि वह पूर्ववर्ती सरकार द्वारा लिए गए सभी फैसलों को आंख मूंदकर स्वीकार कर ले। विगत अप्रैल में तारिक रहमान सरकार के संस्कृति मंत्री निताई रायचौधुरी ने कहा था कि चिन्मई की रिहाई की राह सुगम करने के लिए संबंधित विभागों से बातचीत कर कदम उठाना होगा। यह सितंबर का महीना है, और चिन्मय कृष्ण दास अब भी जेल में हैं। फिर, मंत्री के आश्वासन का क्या हुआ?        


इस बीच चिन्मय कृष्ण की गिरफ्तारी से भी मर्मांतक घटना घट गई। चिन्मय की मां गंभीर रूप से बीमार थीं। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने बेटे को देखने की इच्छा जताई थी। परिवार ने नौ सितंबर को जब पैरोल पर चिन्मय को रिहा करने की अपील की, तो प्रशासन ने कहा कि बीमार को देखने के लिए पैरोल पर रिहा करने का नियम नहीं है। उसी दिन पैरोल के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को भी पत्र भेजा गया। पर, बेटे को देखे बिना ही मां ने प्राण त्याग दिए। किसी व्यक्ति पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, लेकिन ऐसी संवेदनहीनता स्तब्ध कर देने वाली है। हालांकि, अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उन्हें पांच घंटे के लिए पैरोल पर छोड़ा गया।
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चिन्मय कृष्ण दास के पूरे घटनाक्रम को मैं एक व्यक्ति का मामला नहीं मानती, बल्कि इसके पीछे एक खतरनाक राष्ट्रीय संस्कृति को देख पाती हूं-एक मुकदमे में जमानत मिले, तो दूसरे मुकदमे में गिरफ्तारी दिखाओ और न्यायिक फैसले से पहले ही लंबे कारावास को सजा में बदल दो। सिर्फ चिन्मय कृष्ण के खिलाफ ही यह सरकारी कार्य-संस्कृति अन्याय नहीं है, अवामी लीग, बीएनपी और जमात के खिलाफ इस तौर-तरीके को भी अन्याय माना जाएगा। ऐसा इसलिए कि न्याय का कोई धर्म नहीं होता, इसकी कोई राजनीति नहीं होती। अपने राजनीतिक विरोधियों को जेल में ठूंसने के लिए राष्ट्र की जिस ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है, कल इसी का इस्तेमाल आपके खिलाफ भी किया जा सकता है।


मैं यह नहीं कह रही कि चिन्मय कृष्ण दास के खिलाफ मुकदमों की जांच नहीं होनी चाहिए। मसलन, आलिफ हत्याकांड के मामले की जांच निश्चित तौर पर होनी चाहिए, लेकिन निष्पक्षता के साथ। अगर सरकार के पास सबूत हों, तो उन्हें अदालत में पेश करें। पर, किसी बेगुनाह को सजा न दें। चिन्मय कृष्ण दास पर लगे आरोपों की जांच अदालत करेगी। यह पूछा जाना चाहिए कि अपराध साबित होने से पहले एक व्यक्ति को और कितना दंड देंगे? उन्हें जमानत पर रिहा कीजिए। उन्हें पहले आजाद कीजिए, फिर अदालत का सामना करने दीजिए। उन्हें पहले ही अपराधी मानकर सजा मत दीजिए।  


मैं चिन्मय कृष्ण की रिहाई चाहती हूं। मैं बांग्लादेश को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखना चाहती हूं, जो अपराध की न्यायिक जांच बेशक करे, पर दोषसिद्धि से पहले ही अपराधी बनाकर किसी को दंडित न करे।  

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