चाउ फिर भी बचे रहे। देंग शियाओ पिंग जैसे ’पूंजीवादी पथगामी‘ नेता भी बचे रहे। कम्युनिस्ट पार्टी, शासन, सेना और कुल मिलाकर जनता पर बेलगाम नियंत्रण के लिए माओ या सोवियत संघ में स्टालिन के पास असीमित साधन नहीं थे। माओ का चीन गरीब देश था। शी 2050 तक, कम्युनिस्ट शासन की पहली शताब्दी पूरी होने पर अमेरिका को पीछे छोड़ देने के हान जनता के संकल्प का प्रतिनधित्व कर रहे हैं।
टैक्स कटौती के मुद्दे पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज ट्रस की सरकार जिस तरह मुसीबत में पड़ गई, शी वैसे किसी भी झंझट से हमेशा मुक्त रहेंगे। एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने हिसाब लगाया है कि सामान्य स्थितियों में शी के लंबे शासन की संभावना है, क्योंकि उनकी माता की उम्र 96 है और उनके पिता 89 साल तक रहे। इस निरंतरता के वैश्विक प्रभाव पड़ने हैं। बार-बार इतिहास का उल्लेख भी गौरतलब है। शी का कहना है, ‘इतिहास को भूलने का अर्थ है विश्वासघात।
इतिहास का वस्तुनिष्ठ अस्तित्व रहता है। इतिहास सबसे बड़ी पाठ्यपुस्तक है। इतिहासहीन देश का कोई भविष्य नहीं होता। पुनर्शक्तीकरण का मार्ग सौ साल के राष्ट्रीय अपमान की स्मृति से गुजरता है।’ राष्ट्रों को अपना इतिहास बेशक याद रखना चाहिए, यह भी अविस्मरणीय रहना चाहिए कि अतीत में अपमान और विखंडन की क्या वजहें रहीं, एक काल अवधि में केंद्रीय शासन की दृष्टि से ऐतिहासिक एकीकरण कैसे संभव हुआ और किन हालात में फिर बिखराव हो सकता है।
लेकिन इतिहास एक दुधारू तलवार है। हिटलर की किताब (मेरा संघर्ष) घृणा से प्रेरित इतिहास से भरी हुई है। इसकी परिणति साठ लाख यहूदियों के कत्लेआम और खुद जर्मनी की तबाही में हुई। इतिहास से ही प्रेरित तुर्कों ने तीस लाख अर्मेनियाइयों की हत्या कर डाली थी। आश्वस्त और नेकनीयत देश चीन की तरह अपने सिर पर इतिहास का भूत नहीं बैठने देते। उनकी वाणी में प्रतिशोध का भाव नहीं होता।
धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक हों या राष्ट्रों का कोई समूह, किसी के भी विरुद्ध प्रतिशोधवादी प्रचार विनाशक ही साबित होता है। ‘सौ सालों के अपमान के इतिहास’ के लिए उपनिवेशवादी ब्रिटेन और फ्रांस जिम्मेदार थे। वह एक खत्म अध्याय है। उसका बदला आज कैसे लिया जा सकता है? और फिर लपेट में भारत भी तो आ जाता है। अफीम युद्धों में ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना में भर्ती भारतीय सैनिकों ने भी भाग लिया था।
अपनी पूंजी बढ़ाने के लिए चीन को अफीमची बनाने की ब्रिटिश कोशिशों में योगदान भारतीय कारोबारियों का भी था। उसकी जवाबदेही आज के भारत की तो नहीं हो सकती। बीसवीं कांग्रेस में एक खतरनाक विरोधाभास छाया रहा। अगर अमेरिका सहित पूरा पश्चिमी खेमा आर्थिक और सामाजिक तौर पर पतनशील है व संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक शक्तिशाली बनना चीन की नियति है, तो फिर भय के मनोविज्ञान का सहारा लेने की क्या मजबूरी?
कांग्रेस के पहले दिन शी ने दुनिया की अग्रणी सेना खड़ी करने का निश्चय व्यक्त किया; उन्मादी राष्ट्रवाद की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने, न कि वाजिब सैनिक आवश्यकताओं के लिए। शी के शासन में राष्ट्रवादी भावनाएं इस हद तक भड़का दी गई हैं कि उन्होंने अपने लिए ही नहीं, उत्तराधिकारियों के लिए भी पीछे जाने का रास्ता बंद कर दिया है। सामरिक कारणों से ही सही, अगर कोई शासक समझौता करना भी चाहेगा, तो उसके सामने कमजोर साबित होने का खतरा बना रहेगा।
भारत के लिए निहितार्थ यह कि सीमा पर शांति नहीं आने वाली। कश्मीर से लेकर मैकमहन रेखा तक चीन दो उद्देश्यों से भारत को उलझाए रखेगा : भारत के सामने चीन और पाकिस्तान से एक साथ युद्ध की स्थायी आशंका और चीन की 150-160 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के मुकाबले तीस-पैंतीस खरब डॉलर वाले भारत पर लगातार आर्थिक बोझ।
यह भी स्पष्ट है कि अप्रैल, 2020 में जिस भूभाग पर चीन ने कब्जा किया था, उसे पूरी तरह खाली तो करेगा ही नहीं, धीरे-धीरे नए कब्जे भी करता रहेगा। हमारे खिलाफ चीन की व्यूह रचना का दूसरा हिस्सा यह है कि दक्षिण एशियाई देशों से भारत को बेदखल करने की प्रक्रिया तेज की जा सकती है। बांग्लादेश और भूटान, दो ही मित्र देश हैं।
बीसवीं कांग्रेस शुरू होने के एक हफ्ते पहले ढाका में चीन के राजदूत ने चीनी विशेषज्ञों और बांग्लादेशी अधिकारियों के साथ तीस्ता नदी क्षेत्र का दौरा किया। प्रधानमंत्री शेख हसीना को संदेश दिया गया कि बहुउद्देशीय तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में चीन सहयोग करने को तैयार है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अड़ियलपन की वजह से तीस्ता समझौता अरसे से रुका हुआ है।
अगले साल होने वाले चुनाव में शेख हसीना हार गईं, तो अतीत की भांति, बांग्लादेश में पाकिस्तान-चीन मोर्चा सक्रिय हो जाएगा। भूटान पर भारत से विमुख होने का दबाव पड़ ही रहा है। 2017 में भारतीय सेना ने आगे बढ़कर दोकलम में चीन का मंसूबा पूरा नहीं होने दिया। चीन की रणनीति है कि भूटान दोकलम का इलाका उसे देकर पश्चिमी सीमा पर चीन की जमीन लेकर समझौता कर ले।
इससे सैनिक स्थिति भारत के प्रतिकूल हो जाएगी। चीन और भारत में आर्थिक खाई तो पटने से रही। अत्याधुनिक हथियारों के मामले में वस्तुतः स्वावलंबी चीन की तुलना में भारत बहुत पीछे है। परमाणु अस्त्रों में अकेले पाकिस्तान ही हमसे आगे है। चीन की नौसेना अमेरिका से आगे निकल चुकी है। चीन की सामाजिक विविधताएं भारत से काफी कम हैं।
चीन में विभाजनकारी आवाजें भी नहीं गूंजतीं। इस चिंताजनक परिदृश्य में भारत के सामने विकल्प बहुत सीमित हैं। बेशक 1962 की पुनरावृत्ति नहीं होगी, पर दो मोर्चों पर युद्ध या सिर्फ चीन से लंबा युद्ध होने पर क्या होगा? चीन से आशंकित जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का रुख भविष्य का रास्ता खोल सकता है।